फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अनुराग कश्यप Special Interview: 'बॉम्बे वेलवेट' चल जाती तो चला जाता फ्रांस...

Sat, 23 Dec 2017 10:47 AM IST
मायादर्पण डेस्क/अमर उजाला
विज्ञापन
Anurag Kashyap - फोटो : Anurag Kashyap
विज्ञापन
निर्माता-निर्देशक अनुराग कश्यप की फिल्मों का खास दर्शक वर्ग है। वह बॉलीवुड की विवादित शख्सियतों में गिने जाते हैं। भारी-भरकम बजट की 'बॉम्बे वेलवेट' फ्लॉप होने से उनकी साख को धक्का लगा, जिससे वह  उबरने की कोशिश में हैं। जनवरी 2018 में वह ला रहे हैं, 'मुक्काबाज'। अनुराग कश्यप से अमर उजाला की विशेष बातचीत...
विज्ञापन


मुक्काबाज ला रहे हैं यानी क्या अब बात करने का वक्त गया? सिर्फ मुक्के चलेंगे?
नहीं, ये तो सिनेमा से बात करने का टाइम आया है। बातों का ऐसा है कि आजकल हर कोई बोलने लगा है। सोशल मीडिया है। हर आदमी के पास कहने को कुछ है।
यह ज्यादा लोकतांत्रिक प्लेटफॉर्म है?
सोशल नेटवर्क से जो अच्छा बदलाव हुआ, वह पहले चार साल में हो गया था। अब तो इसका इस्तेमाल चालू हो गया है।
ये इस्तेमाल किस दिशा में हो रहा है?
जिसके पास ताकत है, वह उसे अपनी दिशा में कर रहा है। सेल्फ सर्विंग हो रही है।

पढ़ें: अनुष्का-विराट की देशभक्ति पर BJP नेता ने उठाए थे सवाल, 'पीकू' के डायरेक्टर ने दिया मुंहतोड़ जवाब

anurag kashyap
माना जाए सोशल मीडिया फेल हो गया?
इस प्लेटफॉर्म से हमारी जो उम्मीदें थीं, वे फेल हो गई हैं। आज हर सवाल का जवाब, नया सवाल पैदा करेगा।
मुक्काबाज में आप किन सवालों के जवाब ढूंढ रहे हैं?
मैं यह समझने-समझाने की कोशिश में हूं कि देश की खेल व्यवस्था में से अच्छे खिलाड़ी क्यों नहीं निकलते। यह यूपी के सामाजिक-राजनीतिक माहौल में आज के एक स्ट्रगलिंग बॉक्सर और उसकी प्रेम की कहानी है।
यह स्पोर्ट्स फिल्म है। इसमें बॉक्सर और उसकी प्रेमिका की जाति के सवाल भी आपने जोड़े हैं। क्या सोचकर?
सवाल खुद जुड़े हैं, मैंने नहीं जोड़े। दुनिया की हर चीज एक-दूसरे से जुड़ी है। हम लोगों ने ईमानदार होना बंद कर दिया है। हमारा सिनेमा ईमानदार नहीं है। मीडिया ईमानदार नहीं है। आप कहते हैं कि फिल्म का विलेन ब्राह्मण है, तो क्या हीरोइन ब्राह्मण नहीं है? हिंदी फिल्मों का हर विलेन हिंदू होता है, तो क्या फिल्में हिंदुओं के खिलाफ हैं? मुझे लगता है कि लोग या तो जानना नहीं चाहते या जानबूझकर गंवार होते जा रहे हैं। हमारा सिनेमा सामाजिक-राजनीतिक चेतना वाला रहा है। 'अछूत कन्या', 'बंदिनी', 'सुजाता' बनी हैं। सिनेमा 1980-90 में गड़बड़ाया। जहां हर आदमी गुड लुकिंग हो गया। कपड़े बदल गए। सब डिजाइनर हो गया। यह एक तबके के लिए सही है, लेकिन दूसरा तबका भी है। इस साल आप देख ही रहे हैं कि कैसी फिल्में चली हैं।
आपने कहा कि सिनेमा और मीडिया ईमानदार नहीं रहे। क्या मतलब?
मेरा मतलब है कि इनमें सत्य नहीं बचा है।

आप कंट्रोवर्सी करके चर्चा में बने रहते हैं?
बहुत सारे लोग मेरे बारे में कुछ नहीं जानते। कुछ मिलते हैं, तो अनुराग बासु कह कर बुलाते हैं। देश के आधे से ज्यादा लोगों ने संविधान नहीं पढ़ा। संविधान कहीं नहीं कहता कि आप सवाल नहीं कर सकते। मैं किसी राजनीतिक दल से नहीं हूं। मेरी लड़ाई सरकार से रही है। जो भी सरकार रहे, मैं सवाल करता हूं। अपने हक के लिए। कोई फिल्म बैन की, तो क्यों की? मेरी समस्या उनके साथ है जिन्हें लगता है कि सब कुछ एक दिन अपने आप बदल जाएगा।
'बॉम्बे वेलवेट' से पहले खूब उछाला गया कि इसके बाद आप फ्रांस जाकर बस जाएंगे। आप क्यों नहीं गए?
मेरा प्लान था जाने का, लेकिन बॉम्बे वेलवेट फ्लॉप हो गई। मेरी फिल्म नहीं चली, मुझ पर जिम्मेदारियां थीं। 90 करोड़ की फिल्म थी। मैं छोड़ कर कैसे चला जाता? वह चल जाती, तो मैं निकल जाता।
कोई ठोस वजह?
वहां मेरा प्रोजेक्ट था। फिल्म करने जा रहा था। वह रोक दी।
90 करोड़ की फिल्म में घाटा होने के क्या परिणाम हुए?
कई हुए। बड़े बजट की फिल्में मिलनी बंद हो गईं। कई चीजें करनी पड़ीं, जो नहीं करना चाहता था। मेरी कड़ी आलोचना हुई। मुझे किसी का करियर खत्म करने का दोषी ठहराया गया। यहां तक कहा गया कि कश्यप भाइयों की साजिश थी, रणबीर का करियर खत्म करने की।
विज्ञापन

anurag kashyap
आप फिल्म बनाने की आजादी की बात करते हैं। आपकी फिल्मों में जिंदगी के नेगेटिव-डार्क शेड्स, क्राइम और न्यूडिटी खूब होती है? क्या यही सिनेमा बनाने की आजादी है? मेरी फिल्मों में ऐसा क्या है, जो जिंदगी में नहीं है और जिसको आप सिनेमा मानते हो। उसमें ऐसा क्या खास है? क्यों होता है कि बाहर लोग मेरी फिल्में देखते हैं और उससे उन्हें हिंदुस्तान समझ आता है। दूसरों की फिल्मों से नहीं आता। जो चीज आपको विचलित करती है, आपको लगता नहीं कि होनी चाहिए। हम विचलित नहीं होते, इसलिए आज देश की हालत ऐसी है। जिस सिनेमा को आप पॉजिटिव समझ रहे हैं, वह आपको खत्म कर रहा है। आप गुंडे, बदमाशों, गैंगस्टर्स से पूछिए कि क्या वे मेरी फिल्में देखकर ऐसे बने या उनका हीरो कौन है? वे बताएंगे संजय दत्त-सलमान खान उनके हीरो हैं। वो जब हीरो को चार फीट उड़कर किसी को लात मारते देखते हैं, तो वैसा बनना चाहते हैं। मेरी फिल्म में रियल वॉयलेंस दिखता है, तो वह परेशान करता है। क्रूरता देखते हैं, तो आंख बंद कर लेते हैं। लोगों को अपनी धारणाएं बदलनी जरूरी है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें