सवाल- आपके घर का माहौल डिसिप्लिन वाला था उस अनुशासन को आपने अपने पूरे करियर में किस तरह से बरकरार रखा है?
गुल पनाग: मेरा मानना है कि मैं यहां तक अपने पिताजी की वजह से पहुंची हूं। उनका अनुशासन मैंने अपनाया है। लक्ष्य का पीछा करना मैंने इन्हीं से सीखा है। जब मैं मिस इंडिया बनी थी तो बीबीसी के संवाददाता ने पूछा कि क्या आप लेफ्टिनेंट जनरल पनाग की बेटी हैं? मैं गिन नहीं सकती हूं। अनगिनत लोग मुझसे इसलिए हाथ मिलाते हैं क्योंकि मैं इनकी बेटी हूं। सेना के माहौल ने हमें अनुशासन दिया। मेरे पिता ने वह अनुशासन हम पर कायम रखा। इनका अनुशासन मेरे लिए सबसे बड़ी सीख है। मेरा पांच साल का बेटा है। मेरी कोशिश रहती है कि वह भी यही अनुशासन सीखे।
आपने गुल पनाग को अनुशासन कैसे सिखाया?
एचएस पनाग: किसी भी माता-पिता के लिए यह फख्र की बात है कि उनके बच्चे अचीवर हैं। मुझे जब कहते हैं कि मैं गुल पनाग का पिता हूं तो मुझे गर्व होता है। रोल मॉडल असल में फेल-सेफ फिलोसॉफी है। सबकी नजरें रोल मॉडल पर होती हैं। अगर आप रोल मॉडल हैं तो नेतृत्व और लोगों को प्रेरित करने की आधी जंग जीत ली जाती है। कोई भी परफेक्ट नहीं होता, लेकिन अपने बच्चे के लिए मेरी कोशिश रही है कि मैं रोल मॉडल बन सकूं। सेना में नेतृत्व का परिवेश मिलता है। नेतृत्व की खूबियां सिखाई जाती हैं। वो सारी बातें आम आदमी और बच्चों के लिए भी लागू होती हैं। जब मैं देखता था कि इनका अनुशासन बिगड़ रहा है तो मैं सोचता था कि इस बात को कैसे बिना ठेस पहुंचाए ठीक किया जाए। जैसे अगर बच्चा शेखी मार रहा हो तो आप उससे कहें कि आप इस दिशा में जाएं, ऐसा कीजिए।
क्या आपने कभी दोस्तों के सामने शेखी बघारी?
गुल पनाग: मैं और मेरे भाई ने इतनी कहानियां बनाई हैं कि बता नहीं सकती। माता-पिता ने हालांकि कभी हमारी पोल नहीं खोली। कुछ किस्सागोई होती है, कुछ कल्पनाएं होती हैं। मैं छोटी थी तो कहती थी कि मिस इंडिया बनूंगी। जब तक मैं 15 साल की हुई, तब तक सब बोलते थे कि जब मिस इंडिया बन जाओ तो ये कर लेना।
एचएस पनाग: फौज की वजह से इन्हें सब सीखने को मिला। घुड़सवारी, तैराकी, पढ़ाई में यह अच्छी थी। यह आर्मी ब्रैट थी। इन्हें इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ने का मौका मिला। यह मुकम्मल युवा थी। ग्रेजुएशन के फाइनल ईयर में जाने वाली थीं। मिस इंडिया का हम 1998 में फाइनल देख रहे थे। तब गुल पनाग ने कहा कि ये तो मैं भी कर सकती हूं। तब मैंने कहा कि उठाओ कागज-पेंसिल। सबसे पहले प्लान बनाओ। हमें तब मॉडल या ग्लैमर इंडस्ट्री का कोई आइडिया नहीं था। हमने सोचा कि एक साल का समय है, क्या-क्या कर सकते हैं। हमने कहा कि आप अपना आत्मविश्वास बरकरार रखें। मैं आपकी फिजिकल फिटनेस और बुद्धिमत्ता पर काम करूंगा। मेरी पत्नी ने कहा कि वे ऐसा परिवेश देने की कोशिश करेंगी कि सब खुश रहें। मैंने इनसे एक लाइन कही जो इन्होंने फाइनलिस्ट के तौर पर बाद में कही- मैं आशावादी हूं। मेरे लिए हर दिन नई चुनौती है। कुछ नया करना, कुछ नई मंजिलों पर पहुंचना है। मैंने कहा कि आपको जीतना है। आपका मुकाबला आपसे ही है। 1999 में ये मिस इंडिया बन गईं। जितने नेतृत्व के सिद्धांत मैंने सेना में सीखे, उसे परिवार में लेकर आए।
आप किस तरह अपने बच्चे की परवरिश कर रही हैं?
गुल पनाग: दबाव हमेशा रहता है। दबाव में किस तरह दिमाग ठंडा रखते हुए ऑपरेट करना है यही सीखने लायक है। मुझे यह सिखाया गया कि आप कहीं भी जाएं, वजूद बनाए रखने का आपका एक तरीका होना चाहिए। यह प्रेशर नहीं है। मेरे लगातार स्कूल बदलते रहे। मुझे मेरे पिताजी ने कभी नहीं सिखाया कि बड़ों से कैसे बात करें। मैं उन्हें देखती थी। मैं सेना में नहीं हूं तो मैं अपने बेटे को वह सब कैसे सिखाऊं, यह चुनौती है। मैं चाहती हूं कि बेटे का एथलीट से जुड़े खेलों पर झुकाव रहे। मैं रोज सुबह दौड़ती हूं। वह मेरे साथ साइकिल चलाता था। साढ़े तीन साल से बिना सपोर्ट के साइकिल चलाने लगा। परिश्रम हमें लगातार करके दिखाना होता है। जो हम जी रहे हैं, उसके हर पहलू से उसे वाकिफ कराना होता है। बच्चों के लिए रोल मॉडल बनना जरूरी है। आपको उदाहरण बनना होगा, तभी बच्चा सीखेगा। स्पोर्ट्स के जरिए अनुशासन सिखाया जा सकता है। मैं खिलाड़ियों की बहुत इज्जत करती हूं। जो अनुशासन या लगनशीलता खेल से आती है, वह कहीं और से नहीं आ सकती। हार को मोटिवेशन में बदलकर आप आगे बढ़ते हैं। मेरा उद्देश्य है कि उसकी मजबूती बढ़ाई जाए, बाद में वह खुद अपना पसंदीदा खेल चुने। खेल में जो मुश्किलें सामने आती हैं, उसी से अनुशासन का महत्व पता चलता है।
खुद गुल पनाग को कभी ऐसी मुश्किलें आईं, जब पिता की सलाह काम आई?
गुल पनाग: समसामयिक विषयों पर हम हमेशा चर्चा करते हैं। मैं हर मामले में और खासकर पैरेंटिंग को लेकर उनसे सलाह लेती हूं। मेरी शुरुआत मिस इंडिया से हुई, लेकिन मैंने उसे जरिया बनाना वह सारी चीजें करने का, जिसे मैं हमेशा से करना चाहती थी। मैंने पायलट का लाइसेंस लिया, अपना प्रोडक्शन हाउस बनाया, लॉ की पढ़ाई की। ...जीतने वाले घोड़े फिनिश लाइन पर आकर नहीं रुका करते। मैं अगला लक्ष्य, अगली चुनौती तय करती थी।
पिता और बेटियों के नाम कोई संदेश देना चाहेंगे?
एचएस पनाग: जहां तक बेटियों की बात है, उन्हें पितृसत्तामक समाज की तरफ से थोंपी गई बातों में नहीं आना चाहिए। बेटियां स्वतंत्र व्यक्तित्व की धनी होती हैं। आप उनकी मदद कर सकें तो करें, नहीं तो उन्हें अपने हिसाब से करने दें। मैं करगिल की लड़ाई के बाद ब्रिगेड कमांडर था, जब ये मिस इंडिया बनीं। मैंने कहा कि आपने पैराशूट एंट्री कर ली है, अब आगे क्या करना है, यह आपको तय करना है। आप फोकस रखिए। इंटेलेक्ट सही रखिए। आपको पढ़ना होगा। जिंदगी में और चीजें सीखनी होंगी। फिटनेस रखनी होगी, आपको इसे बरकरार रखना है। 20 साल बाद ये ज्यादा फिट हैं। आप अपना चरित्र बनाए रखें। कम्युनिकेशन सही रखना है। और आखिर में हमेशा पहल करनी है। इंतजार नहीं करना है कि कोई चीज खुद चलकर आप तक आएगी। अगर हम बेटियों को यह प्रेरणा दे सकें तो इससे बेहतर कुछ नहीं होगा। गुल ने फिल्में भी की हैं, लेकिन वह एक छोटा सा हिस्सा रही हैं। मेरी बेटी उम्मीदों पर खरी उतरी हैं।