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बादशाहो देखने जा रहे हैं तो जान लें ये 10 बातें

Sat, 02 Sep 2017 01:19 PM IST
रवि बुले
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बादशाहो
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पिछले एक हफ्ते से 'बाबू मोशाय बंदूकबाज' ने बॉक्स आफिस पर धमाल मचा रखा था। 'अ जेंटलमैन' भी मशक्कत के साथ ही सही मगर दर्शक खींच ही रही थी। अब इस हफ्ते से बादशाहो ने बॉक्स ऑफिस पर एंट्री की है। पहले दिन का कलेक्शन भी अच्छा रहा। ऐसे में अगर आप देखने जा रहे हैं 'बादशाहो' तो पहले जान लें ये 10 बातें।  
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1-बादशाहो की कहानी 1975 में देश में लगे आपातकाल के दरमियान घटती है। इसमें संजय गांधी नुमा गेट-अप लगाए नेता संजीव, जो महारानी गीतांजलि (इलियाना डिक्रूज) के हुस्न को पाने में पहले नाकाम रहा था, उनके महल में छुपे खजाने को जब्त करने का हुक्म देता है।
 
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 2-इस खजाने को दिल्ली पहुंचाने की जिम्मेदारी आर्मी अफसर सहर (विद्युत जामवाल) की है। लेकिन महारानी के विश्वसपात्र/प्रेमी भवानी (अजय देवगन) और उसके दोस्तों (इमरान हाशमी, संजय मिश्रा) के होते हुए यह कैसे संभव है?
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 3-राजा-रानियों की कहानियों में साजिशें न हों ऐसा तो हो ही नहीं सकता। इससे कहानी का ऊंट अचानक करवट बदल लेता है। इस बदलाव से कहानी और लचर नजर आती है।
 
 4-फिल्म न तो अजय देवगन के फैन्स के लिए है और न इसे इमरान हाशमी का प्रभावी रोल कह सकते हैं। इमरान की ‘किस’ के दीवाने तो मायूस ही हो जाएंगे। अजय अभिनय में कुछ नया नहीं जोड़ते और उनकी पुरानी इमेज का असर यहां नहीं दिखता है।
 
 5-थोड़े प्रभावी कोई हैं तो इलियाना और विद्युत। परंतु उनके किरदारों का विस्तार नहीं है। ईशा गुप्ता क्या कर रही हैं, पूरी फिल्म में इसका उत्तर आखिर तक आप खोज नहीं पाएंगे।
 
6-बादशाहो की कहानी और पटकथा दोनों फिल्म को कमजोर बनाती हैं। मेरे रश्के कमर के अलावा गीत-संगीत ठंडा है। बादशाहो ऊंचे लोगों की ऊंची पसंद टाइप फिल्म नहीं है।
 
7-अगर अस्सी के दशक में यह आती तो ठीक लगती, मगर तब भी कामयाब होने के लिए अच्छे क्लाइमेक्स की जरूरत पड़ती। फिर यह तो 2017 है।

8-कुल मिलाकर राइटर-डायरेक्टर को पता ही नहीं है कि आखिर वो कहना क्या चाहते हैं? क्या वह कहना चाहते हैं कि इमरजेंसी के दौर में एक विधवा महारानी का खजाना सरकार ने लूट लिया या लूटने की कोशिश की थी?

9-खजाने की मालकिन महारानी अपने जगप्रसिद्ध सौंदर्य का इस्तेमाल लोगों को अपना प्यादा बनाने में  शातिर तरह से करती थी? वह दिखावे के लिए अपनी जनता के प्रति रहम दिल थी मगर असल में उनका खून पीती थी?

10- फिल्म की कहानी के प्रेरणा-सूत्र कयासों की धुंध में है तो लेखक-निर्देशक ने अपनी कल्पना से ऐसा रायता फैलाया कि अंत में उन्हीं से समेटते नहीं बना। किसी फिल्म का बादशाहो जैसा खराब क्लाइमेक्स वर्षों में आपने नहीं देखा होगा। अगर खराब क्लाइमेक्स देखने का मन है तो जरूर फिल्म देख सकते हैं।
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