सुपरस्टार रजनीकांत की फिल्म ‘कुली’ इन दिनों सिनेमाघरों में बनी हुई है। शुक्रवार को रिलीज हुई फिल्म ने पहले दिन ही बॉक्स ऑफिस पर तूफान लाते हुए धुआंधार कमाई की। ‘कुली’ रजनीकांत के लिए काफी अहम फिल्म है, क्योंकि ये फिल्म उनके सिनेमा में पचास साल पूरे होने के मौके पर रिलीज हुई है। आज से 50 साल पहले रजनीकांत ने फिल्मी दुनिया में कदम रखा था। 15 अगस्त 1975 को रिलीज हुई फिल्म ‘अपूर्व रागंगल’ रजनीकांत की पहली फिल्म है। ये वो ही साल था जब भारतीय सिनेमा को उसकी ऐतिहासिक फिल्म ‘शोले’ मिली थी। इस फिल्म से शुरू हुआ एक बस कंडक्टर के एक्टर बनने का सफर 50 साल बाद एक सुपरस्टार का सफरनामा बन चुका है। इस मौके पर जानते हैं कैसे मिली रजनीकांत को उनकी फिल्म और उस फिल्म से जुड़े कुछ किस्से।
फिल्मों में आने से पहले बस कंडक्टर थे रजनीकांत
फिल्मों में आने से पहले रजनीकांत का जीवन काफी संघर्षमय था। रजनीकांत फिल्मों में आने से पहले एक कुली और बस कंडक्टर रह चुके हैं। रजनी के टिकट बेचने का तरीका काफी स्टाइलिश था, जिसकी वजह से वो यात्रियों और बस ड्राइवर्स व कंडक्टरों में काफी मशहूर भी थे। हालांकि, रजनीकांत को एक्टिंग का शौक शुरू से ही था। लेकिन पैसों की कमी और साधनों के अभाव के चलते वो अपने इस सपने को पूरा करने में असमर्थ थे।
एक बस ड्राइवर दोस्त ने की मदद
रजनीकांत को फिल्मों की दुनिया में लाने वाला अगर कोई है तो वो हैं उनके दोस्त राज बहादुर। राज बहादुर कोई निर्देशक या अभिनेता नहीं, बल्कि उनकी ही तरह एक बस ड्राइवर थे। रजनीकांत और राज बहादुर की मुलाकात साल 1970 में उनके बैंगलोर ट्रांसपोर्ट सर्विसेज में काम करने के दौरान हुई थी। राज बहादुर ही वह व्यकित थे, जिन्होंने रजनीकांत की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें एक्टर बनने के अपने सपने को पूरा करने के लिए कहा।
रजनीकांत अपनी आर्थिक स्थिति के कारण इस क्षेत्र में जाने से घबरा रहे थे। लेकिन राज बहादुर ने यहां भी उनकी मदद की। राज बहादुर उस वक्त केवल 400 रुपये कमाते थे, लेकिन उन्होंने फिर भी रजनीकांत की मदद की और उन्हें मद्रास फिल्म इंस्टीट्यूट में दाखिला दिलाया और हर महीने अपनी आधी तनख्वाह उन्हें भेजते थे। रजनीकांत को तमिल भी नहीं आती थी, इसलिए एक्टिंग सीखने के साथ-साथ तमिल भाषा का ज्ञान भी हासिल किया।
के. बालचंद्र ने पहचानी रजनीकांत की प्रतिभा
एक्टिंग सीखने के दौरान ही रजनीकांत की मुलाकात दिग्गज फिल्म निर्देशक के. बालचंद्र से हुई। के. बालचंद्र ही वो निर्देशक हैं जिन्होंने रजनीकांत की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें पहली बार अपनी फिल्म में मौका दिया। के. बालचंद्र ही वो शख्स भी हैं जिन्होंने रजनीकांत को उनका नाम दिया। दरअसल, रजनीकांत का असली नाम शिवाजी राव गायकवाड़ है, लेकिन के. बालचंद्र ने फिल्मों में आने के लिए उनका नाम रजनीकांत रखा। रजनीकांत का नामकरण 27 मार्च 1975 को होली के मौके पर हुआ था और दिन था गुरुवार। जिसे रजनीकांत अपने लिए शुभ मानते थे। यही कारण है कि जब इसी दिन उनका नामकरण हुआ तो वो काफी खुश थे और उनके लिए ये नाम सफल भी साबित हुआ।
पहली फिल्म में निभाया विलेन का किरदार
रजनीकांत ने के. बालचंद्र की फिल्म ‘अपूर्व रागंगल’ से एक्टिंग की दुनिया में कदम रखा। इस फिल्म में कमल हासन और श्रीविद्या प्रमुख भूमिका में थे। जबकि रजनीकांत ने फिल्म में निगेटिव भूमिका निभाई थी। ‘अपूर्व रागंगल’ में रजनीकांत की भूमिका छोटी थी।
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जब सेट से बाहर जाकर बैठ जाते थे रजनी, बालचंद्र ने लगाई फटकार
पहली फिल्म की शूटिंग से जुड़ा एक किस्सा काफी मशहूर है। दरअसल, फिल्म की शूटिंग गुरुवार के दिन नहीं शुरू हुई थी। ऐसे में रजनीकांत काफी निराश थे, क्योंकि वो गुरुवार के दिन को अपने लिए शुभ मानते थे। पहले दो दिनों तक उनके पास शूटिंग के लिए कोई सीन नहीं था क्योंकि लीड एक्टर कमल हासन अपने हिस्से की शूटिंग कर रहे थे। ऐसे में सेट पर इधर-उधर घूमने के बजाय रजनी बाहर जाकर बैठ जाते थे और धूम्रपान करते। जब ये बात के. बालचंद्र को पता चली तो वो रजनीकांत पर चिल्लाए, 'क्या तुम सीखना नहीं चाहते?' अनुभवी अभिनेता ज्ञान का खजाना होते हैं और उन्हें काम करते देखना कला सीखने का एक तरीका होता है। बालचंद्र अपने आक्रामक स्वभाव के लिए जाने जाते थे।
कमल हासन को देखकर सीखे एक्टिंग के गुर
कमल हासन को वाकई में एक्टिंग का गुरु माना जाता है। ऐसे में उनको एक्टिंग करते देखना वाकई में एक खास अनुभव है। निर्देशक से डांट पड़ने के बाद रजनीकांत काफी गंभीर हो गए और कमल हासन से काफी कुछ सीखने लगे।
हमेशा के लिए यादगार बन गया पहला सीन
‘अपूर्व रागंगल’ में अपने पहले सीन में बिना दाढ़ी-मूंछ वाले चेहरे और मैले-कुचैले कपड़ों में अस्त-व्यस्त रजनीकांत को एक घर का दरवाजा खोलकर परिसर में प्रवेश करना था। यह सीन रजनीकांत के लिए काफी खास है। अपने शुरुआती सीन में रजनीकांत घबराए हुए थे। पहला शॉट में कई टेक देने पड़े थे। के. बालाचंद्र का धैर्य जवाब देने लगा था, लेकिन वे समझ गए कि नया अभिनेता घबराया हुआ है।
रजनीकांत के पास उस सीन में सिर्फ दो लाइन्स ही थीं। “वह बालकनी में खड़े प्रसन्ना से पूछता है- ‘क्या यह भैरवी का घर है?’ युवक जवाब देता है हां। तुम कौन हो? तब रजनीकांत का किरदार हिचकिचाते हुए जवाब देता है 'मैं उसका पति हूं। यह सुनकर प्रसन्ना चौंक जाता है। इस सामान्य से सीन को रजनीकांत ने आसानी से निभाया और इस तरह से पहली फिल्म में उनका किरदार पूरा हुआ।
फैंस को पसंद आया रजनीकांत का काम, के. बालचंद्र हुए संतुष्ट
रजनीकांत के इन सीन्स को दर्शकों ने काफी पसंद किया और फिल्म हिट रही। रजनीकांत की परफॉर्मेंस की चर्चा हुई और यह देखकर अगर सबसे ज्यादा कोई खुश था तो वे थे के. बालचंद्र। बालाचंद्र रजनीकांत के अभिनय से संतुष्ट थे और खुश थे कि उनकी खोज सही साबित हुई।
खुद को बड़े पर्दे पर देखकर रो पड़े थे रजनीकांत
15 अगस्त 1975 को जब ‘अपूर्व रागंगल’ सिनेमाघरों में रिलीज हुई और रजनीकांत ने खुद को पहली बार बड़े पर्दे पर देखा तो वो अपने आंसुओं को रोक नहीं सके। बस कंडक्टर से लेकर बड़े पर्दे पर पहुंचने के अपने सफर को देखकर रजनीकांत खुशी से रो पड़े। ‘अपूर्व रागंगल’ से शुरू हुआ रजनीकांत का सफर आज 50 साल बाद भी अनवरत चल रहा है।