आबादी 17 करोड़ और देश की सौ लोकसभा सीटों पर प्रभाव। इनमें से 65 सीटों पर 30 फीसदी से अधिक, तो 40 सीटों पर 35 से 70 फीसदी वोट की हिस्सेदारी। बावजूद इसके टिकट वितरण मामले में मुस्लिम वर्ग किसी दल के एजेंडे में नहीं है। खुद को धर्मनिरपेक्ष बताने वाले दलों ने भी समानांतर ध्रुवीकरण के भय से इस वर्ग की विकल्पहीनता को हथियार बनाया है।
समानांतर ध्रुवीकरण का सता रहा डर
सत्तारूढ़ एनडीए के इतर विपक्ष की मुसलमानों से बरती दूरी को बीते दो लोकसभा चुनावों में अल्पसंख्यक मुसलमानों के ध्रुवीकरण के जवाब में बहुसंख्यकों के समानांतरण ध्रुवीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है। मुसलमानों से जुड़े संगठनों का आरोप है कि विपक्षी दल उसकी बिरादरी की सियासी विकल्पहीनता को हथियार बना रहे हैं।
सभी दलों ने डाले डोरे मगर...
मुसलमानों का वोट हासिल करने के लिए सभी दलों ने डोरे तो बहुत डाले, मगर टिकट वितरण के दौरान इन्हें घास नहीं डाला। मसलन भाजपा ने पसमांदा मुसलमानों को जोड़ने की पहल की। न दूर है न खाई है, मोदी हमारा भाई है, अभियान चलाया, मगर यह प्रेम टिकट वितरण में नहीं दिखा। विपक्षी गठबंधन ने भी इस बिरादरी को साधने के लिए कई वादे किए, मगर टिकट देने से दूरी बनाई।
चिंताजनक है लोकसभा में नेतृत्व
अब तक के 17 आम चुनाव में लोकसभा में मुसलमानों का सबसे अधिक प्रतिनिधित्व 1980 में रहा। तब इस बिरादरी के 49 सांसद चुने गए थे। 2004 में यह संख्या 34, 2009 में 30, 2014 में 22 और 2019 में 27 रह गई। 2014 के चुनाव में पहली बार यूपी में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व शून्य रहा। इसके बाद मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में मंत्रिमंडल विस्तार के बाद सरकार में भी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व शून्य हो गया।