पश्चिमी उप्र जहां किसानों एवं गांवों का क्षेत्र है तो वहीं इसमें नोएडा और गाजियाबाद जैसी हाईटेक सिटी भी शामिल हैं। यही कारण है कि यहां का वोटर नई और पुरानी, दोनों ही विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करता है। प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से पश्चिमी यूपी की 27 सीटों पर चुनाव शुरुआती तीन चरणों में ही लगभग पूरा हो जाएगा। ऐसे में इन सीटों पर अपनी विजय पताका फहराने के लिए सभी दलों ने मशक्कत शुरू कर दी है।
इस बार किसके साथ मुस्लिम
खास तौर से पश्चिमी उप्र में मुस्लिम वोटरों की संख्या किसी भी चुनाव का परिणाम बदलने का माद्दा रखती है। सपा, बसपा ने पिछले चुनाव में इसी समीकरण के जरिए आठ सीटें जीती थीं। वर्ष 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जाटों और मुस्लिमों के बीच जो दूरी बढ़ी, वह रालोद के लगातार प्रयास से कम हुई थी। दोनों ही पक्षों ने इस दर्द को भुलाया और लगातार एक-दूसरे का हाथ थाम कर चल रहे थे। चाहे पिछले लोकसभा चुनाव का परिणाम हो या फिर विधानसभा का, मुस्लिमों ने खुले दिल से रालोद को वोट दिया।
नजदीकी मुकाबलों पर पैनी नजर
पश्चिमी उप्र से ही चुनावी बिगुल बज रहा है। तीन चरणों में पश्चिम की सभी सीटों पर चुनाव हो चुका होगा। ऐसे में यहां से निकला संदेश दूर तक जाएगा। पिछले चुनाव में नौ सीटों पर जीत का मार्जिन 25 हजार वोटों से भी कम था। कन्नौज, बदायूं, सुल्तानपुर और चंदौली के अलावा इनमें पश्चिमी यूपी की मेरठ, बागपत और मुजफ्फरनगर की सीट भी शामिल थी। भाजपा के सामने जहां इस बार इन सीटों को ज्यादा वोटों के अंतर से जीतने की चुनौती है, तो विपक्ष चाहेगा कि इस अंतर को कम करते हुए बाजी मार ली जाए।
चंद्रशेखर की नगीना से तैयारी
आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद नगीना से अपनी ही पार्टी से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। विधानसभा चुनाव में वह सपा-रालोद के गठबंधन के साथ थे। दलितों में इनका प्रभाव है। ऐसे में पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में असर पड़ेगा।
किन-किन सीटों पर कौन-कौन से योद्धा आए मैदान में
बिखरे जाटों को जोड़ने का दांव
पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के समय से ही जाट वोटर इस परिवार से जुड़ा रहा। जाट रालोद के लिए सबसे मजबूत वोट बैंक माने जाते रहे हैं। हालांकि वर्ष 2014 के आंकड़ों ने सभी को चौंका दिया। तब चुनाव में रालोद को मिलने वाला जाट समर्थन जबरदस्त तरीके से गिरा। थिंक टैंक सीएसडीएस के एक अध्ययन के अनुसार तो जाट वोटर भाजपा की ओर शिफ्ट होने लगा।
2012 के विधानसभा चुनावों में जाटों में भाजपा का जनाधार मात्र 7 प्रतिशत था। दो साल बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 77% जाट वोट मिले और पिछले लोकसभा चुनाव में भी थोड़ी गिरावट के साथ ही सही, यह सिलसिला जारी रहा।
रालोद को वर्ष 2014 के चुनाव में सिर्फ 0.9% वोट मिले थे, वह भी उस सूरत में जबकि उसे सपा और कांग्रेस का समर्थन था। वर्ष 2019 के चुनाव में बसपा भी साथ आई तो रालोद का वोटर शेयर 1.7 प्रतिशत हो गया, पर जीत की दहलीज से वह कोसों दूर ही रह गया। अब भाजपा ने जहां अन्य बचे जाटों को अपने पाले में लाने का दांव चला, तो रालोद ने भी इसे अहमियत दी।
जातीय ताने-बाने को सुलझाना बड़ी चुनौती
सैनी : सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बुलंदशहर, शामली, बिजनौर, अमरोहा और मुरादाबाद में सैनी समाज का बड़ा वोट बैंक है। अधिकतर सीटों पर इनकी संख्या दो से ढाई लाख है।
गुर्जर : मेरठ, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, बिजनौर, शामली, बागपत, सहारनपुर में गुर्जर निर्णायक भूमिका में हैं। यही वजह है कि गुर्जरों को लुभाने में सभी पार्टियां जुटी हुई हैं।
कश्यप : सामाजिक-न्याय समिति की 2001 की रिपोर्ट के अनुसार कहार, कश्यप, धींवर जाति के लगभग पच्चीस लाख लोग राज्य में रहते हैं। पश्चिमी उप्र में इन्हें केवल कश्यप या धींवर नाम से जाना जाता है। मुजफ्फरनगर, शामली, सहारनपुर, मेरठ, बागपत, मुरादाबाद, बरेली, आंवला, बदायूं जिले में इनका वोटर काफी महत्वपूर्ण है।
यादव : पश्चिमी यूपी की विभिन्न सीटों पर यादवों का भी खासा वोट बैंक है। बागपत, बुलंदशहर, मुरादाबाद, एटा, मैनपुरी सहित कई सीटों पर यादव निर्णायक भूमिका में हैं।
ठाकुर : पश्चिमी यूपी में हिंदू और मुस्लिम दोनों में ही ठाकुर हैं। गाजियाबाद, शामली, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, हापुड़, बुलंदशहर, अलीगढ़, मुरादाबाद, मेरठ, बरेली में सियासी तौर पर काफी मजबूत माने जाते हैं। किसी भी दूसरी जाति के साथ जुगलबंदी कर ठाकुर पश्चिमी उप्र में उम्मीदवारों को जीत दिलाते आए हैं।
ब्राह्मण एवं त्यागी : मेरठ, बुलंदशहर, गौतमबुद्धनगर, गाजियाबाद, अलीगढ़, हाथरस आदि में ब्राह्मण मतदाताओं का खासा दबदबा है। कभी कांग्रेस का वोट बैंक माने जाने वाले ब्राह्मण और त्यागी दोनों को ही भाजपा अपना वोट बैंक मानती है। हालांकि बसपा ने कई बार सोशल इंजीनियरिंग के जरिए ब्राह्मणों पर दांव लगाया, पर पिछले कई चुनावों से यह दांव फेल ही रहा।
वैश्य : कई सीटों पर वैश्य मतदाताओं की अच्छी-खासी संख्या है। यही वजह है कि मेरठ जैसी सीट पर भाजपा पिछले कई चुनाव से वैश्य उम्मीदवार उतारती रही है।