लोकसभा चुनाव में सबकी निगाहें एक बार फिर से हिंदी पट्टी के दस राज्यों पर हैं। लोकसभा में 225 सांसद भेजने वाले यह दस राज्य आजादी के बाद से अब तक दलों-गठबंधनों के लिए दिल्ली का रास्ता तैयार करते हैं। बीते चुनाव में इन्हीं राज्यों में दमदार प्रदर्शन ने भाजपा की लगातार दूसरी बार अपने दम पर सत्ता हासिल करने की हसरत पूरी की, तो इन्हीं राज्यों के मतदाताओं ने कांग्रेस के लिए सत्ता का सूखा खत्म करना तो दूर प्रतिष्ठा बचाने लायक भी नहीं छोड़ा।
इन दस राज्यों के मतदाताओं में हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और सामाजिक न्याय के प्रति गहरा आकर्षण रहा है। बीते चुनाव में इन तीनों ही मोर्चे पर भाजपा बेहतर बूथ प्रबंधन और बेहतर रणनीति की बदौलत अपने विरोधियों पर भारी पड़ी। कांग्रेस को जहां इन राज्यों में अपने दम पर महज 5 सीटें आई थी, वहीं भाजपा ने अपने दम पर 177 तो सहयोगियों के साथ 203 सीटें जीत कर विपक्ष की कमर तोड़ दी थी।
बिहार में जोरआजमाइश
राज्य में राजग और विपक्षी महागठबंधन आमने सामने है। दोनों ही गठबंधनों में सहयोगी दलों की भरमार है। चुनाव से ठीक पहले जदयू को साध कर भाजपा ने विपक्ष को करारा झटका दिया है। राजद की अगुवाई में विपक्ष सामाजिक न्याय के सहारे राजग को घेरने की कोशिश में जुटी है। यहां राजग के साथ नीतीश, मांझी, कुशवाहा और लोजपा है।
हिंदी पट्टी के राज्य: हिंदी पट्टी में यूपी (80), बिहार (40), मध्यप्रदेश (29) झारखंड (14), राजस्थान (25), हरियाणा (10), दिल्ली (7), उत्तराखंड (5), हिमाचल (4) और छत्तीसगढ़ (11) राज्य शामिल हैं।
राजग के मुद्दे: भाजपा खासकर कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक के नेताओं की हिंदी और हिंदीविरोधी टिप्पणी को मुद्दा बना रहा है। भाजपा ने इस क्षेत्र में हिंदुत्व और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन बनाने के साथ सोशल इंजीनियरिंग के तहत कई क्षेत्रीय दलों को साधा है।
विपक्ष के मुद्दे: कांग्रेस की अगुवाई वाला इंडिया ब्लॉक ने हिंदी पट्टी में सामाजिक न्याय को अहम मुद्दा बनाया है। इसके तहत केंद्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना, जनादेश मिलने के बाद जाति की संख्या के आधार पर आरक्षण देने का वादा किया है। महंगाई और बेरोजगारी के सवाल को भी उठाया जा रहा है।
भाजपा की चुनौती भी कम नहीं है...
बीते चुनाव में हिंदी पट्टी ने ही भाजपा की लगातार दूसरी बार धमाकेदार जीत की पटकथा लिखी थी। पार्टी ने तब सहयोगियों के सहारे पांच राज्यों राजस्थान, दिल्ली, हिमाचल, उत्तराखंड और हरियाणा में क्लीन स्वीप किया था। गठबंधन को बिहार की 40 में से 39, झारखंड की 14 में से 12 और अपने दम पर मध्यप्रदेश की 29 में 28, छत्तीसगढ़ की 11 में नौ और यूपी की 80 में से 64 सीटें हाथ लगी थी। जाहिर तौर पर अगर भाजपा ने पुराना प्रदर्शन नहीं दोहराया तो उसका चार सौ पार का नारा परवान चढ़ना तो दूर सत्ता बचाने के लिए संघर्ष करना होगा।
बसपा के साथ कांग्रेस-सपा गठबंधन पर नजर
- हिंदी पट्टी के केंद्र में उत्तर प्रदेश है, जहां इस बार नए समीकरण बने हैं। बसपा अकेले मैदान में है।
- रालोद ने सपा का साथ छोड़ दिया है तो सपा कांग्रेस के साथ है। भाजपा अपना दल, रालोद, सुभासपा और निषाद पार्टी के साथ मैदान में है।
- बसपा, सपा दोनों के लिए यह चुनाव करो या मरो का सवाल है। भाजपा के सहयोगियों ने अगर बेहतर प्रदर्शन में मदद नहीं की तो इनकी प्रासंगिकता भी घटेगी।
कांग्रेस को मरहम पट्टी की जरूरत
कांग्रेस अगर बीते दो चुनावों में नेता प्रतिपक्ष का पद हासिल करने में भी नाकाम रही तो इसका कारण हिंदी पट्टी में उसका निराशाजनक प्रदर्शन रहा। पार्टी इन नौ राज्यों में से छह राज्य में खाता तक नहीं खोल पाई। उसे 80 सीट वाले यूपी, 40 सीट वाले बिहार, 29 सीट वाले मध्यप्रदेश में महज एक-एक और छत्तीसगढ़ में दो सीटें हासिल हुई थी। तब कांग्रेस की अगुवाई वाला यूपीए भी महज छह सीट जीत पाया। जाहिर तौर पर हिंदी पट्टी में कांग्रेस को मतदाताओं से सहानुभूति हासिल करने की जरूरत है। इसमें नाकाम रहने पर उसका सत्ता का सूखा खत्म करने का सपना पूरा नहीं होगा।