तीन साल की उम्र में खो दी थी दृष्टि :
लुई ब्रेल ने एक दुर्घटना में तीन साल की उम्र में अपनी दृष्टि खो दी थी। उनकी आंखें संक्रमित हो गईं और ब्रेल पूरी तरह से अपनी दृष्टि खो बैठे थे। अपनी दृष्टिहीनता के बावजूद, ब्रेल ने अकादमिक रूप से उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और एक छात्रवृत्ति पर रॉयल इंस्टीट्यूट फॉर ब्लाइंड यूथ चले गए। जब वह संस्थान में अध्ययन कर रहे थे तो उसी दौरान ब्रेल ने अंधेपन से पीड़ित लोगों को पढ़ने और लिखने में मदद करने के लिए एक स्पर्श कोड विकसित किया। जिसे बाद में ब्रेल लिपि के नाम से जाना गया।
कैप्टन बार्बियर से मुलाकात ने बदली जिंदगी :
स्कूल के दिनों के दौरान लुई ब्रेल की मुलाकात सेना के कैप्टन चार्ल्स बार्बियर से हुई, जिन्होंने सेना के लिए एक विशेष क्रिप्टोग्राफी लिपि का विकास किया था, जिसकी मदद से सैनिक रात के अंधेरे में भी संदेशों को पढ़ सकते हैं। बाद में, ब्रेल ने कैप्टन बार्बियर की सैन्य क्रिप्टोग्राफी से प्रेरित एक नई विधि का निर्माण किया। तब उनकी उम्र करीब 16 वर्ष थी।
12 बिंदुओं पर आधारित थी शुरुआती लिपि :
यह कूट लिपि 12 बिंदुओं पर आधारित थी। 12 बिंदुओं को 66 की पंक्तियों में रखा जाता था। हालांकि, तब इसमें विराम, संख्या और गणितीय चिन्ह मौजूद नहीं थे। लुई ब्रेल ने इसमें आगे और सुधार करते हुए 12 की जगह 06 बिंदुओं का उपयोग कर 64 अक्षर और चिह्न का आविष्कार किया था, जिसमें उन्होंने विराम चिन्ह, संख्या, बढ़ और संगीत के नोटेशन लिखने के लिए भी जरूरी चिह्न उपलब्ध कराए थे। उनकी इस लिपि को ही ब्रेल लिपि के नाम से जाना जाता है।
ब्रेल का काम पहली बार 1829 में प्रकाशित हुआ था :
1824-25 में ब्रेल ने पहली बार सार्वजनिक रूप से अपने काम को प्रस्तुत किया। कुछ साल बाद, ब्रेल ने एक प्रोफेसर के रूप में सेवा की और अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण समय ब्रेल लिपि प्रणाली का विस्तार करने में बिताया। ब्रेल ने 1829 में पहली बार ब्रेल लिपि प्रणाली प्रकाशित की। आठ साल बाद उनकी इस भाषा पर एक बेहतर संस्करण प्रकाशित हुआ।