अनुपालना कार्रवाई रिपोर्ट भेजने का निर्देश
ठाकुर ने पत्र में कहा कि विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और कॉलेज के प्राचार्यों से अनुरोध है कि वे अपने कानूनों, अध्यादेशों, नियमों और विनियमों में आवश्यक बदलाव के लिए कदम उठाएं, ताकि उनके संस्थानों में प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस (पीओपी) को शामिल किया जा सके। आयोग ने इस संबंध में अनुपालना कार्रवाई रिपोर्ट भी मांगी है। प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस दुनियाभर में एक आम बात है, जो मुख्य रूप से गैर-कार्यकाल वाले संकाय सदस्य हैं, मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT), हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी, एसओएएस यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन, कॉर्नेल यूनिवर्सिटी और हेलसिंकी विश्वविद्यालय जैसे कुछ विश्वविद्यालयों में प्रचलन में हैं।
संख्या स्वीकृत पदों के 10 फीसदी से अधिक नहीं
भारत में भी, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली, मद्रास और गुवाहाटी में प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस नियुक्त किए जाते हैं। यूजीसी ने पिछले महीने अधिसूचित किया था कि विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षा संस्थान अब विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस श्रेणी के तहत विशिष्ट विशेषज्ञों को संकाय सदस्यों के रूप में नियुक्त कर सकेंगे, जिसके लिए औपचारिक शैक्षणिक योग्यता और प्रकाशन की आवश्यकताएं अनिवार्य नहीं होंगी। दिशा-निर्देशों के अनुसार, किसी भी समय उच्च शिक्षा संस्थान (एचईआई) में प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस की संख्या स्वीकृत पदों के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए और उन्हें तीन श्रेणियों उद्योगों द्वारा वित्त पोषित, एचईआई द्वारा वित्त पोषित उनके अपने संसाधन, और मानद आधार आदि में नियुक्त किया जाना चाहिए।
सेवा की अधिकतम अवधि तीन वर्ष से अधिक नहीं
दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि किसी दिए गए संस्थान में सेवा की अधिकतम अवधि तीन वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए, असाधारण मामलों में एक वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है। प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस की नियुक्ति एक निश्चित अवधि के लिए होगी। उनकी भर्ती किसी विश्वविद्यालय या कॉलेज के स्वीकृत पदों से अलग होगी। यह स्वीकृत पदों की संख्या और नियमित संकाय सदस्यों की भर्ती को प्रभावित नहीं करेगा। यह योजना शिक्षण पदों पर सेवारत या सेवानिवृत्त लोगों के लिए नहीं होगी।