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मंजिलें और भी हैं: यात्राएं सिखाती हैं कि कैसे मुश्किल की घड़ी में अकेले निपटना है

Wed, 16 Oct 2019 12:59 AM IST
देव कश्यप सुधा महालिंगम
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Sudha Mahalingam - फोटो : अमर उजाला
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मेरी मां मुझसे हमेशा कहती थीं, अगर समुद्र में नहाना है, तो लहरों के थमने का इंतजार मत करो। समुद्र में उस वक्त उतरो, जब लहरें तुमसे टकराती हों, क्योंकि वे कभी रुकती नहीं हैं। ठीक उसी तरह दुनिया घूमना हो, तो उस वक्त का इंतजार मत करो, जब जिम्मेदारियां तुम्हें चारों ओर से घेर लें, जिम्मेदारियां हैं, तो भी यात्रा करो और यात्रा करने का अवसर खोजो। क्योंकि घूमने के लिए सही समय का इंतजार नहीं किया जाता।

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मैं उनकी बातों को सुनती थी, पर उस वक्त मुझे पता नहीं था कि आगे चलकर ये बातें सूत्र वाक्य बन जाएंगी। मैं चेन्नई की रहने वाली हूं। यात्राएं अब मेरे जीवन का अहम हिस्सा बन चुकी हैं। मैं पेशे से पत्रकार थी, उस दौर में कई प्रमुख संस्थानों के साथ काम किया है। मैंने ऊर्जा से संबधित मुद्दों पर काफी काम किया है। जब मैं पत्रकार थी, तब अपने ब्यूरोक्रेट पति के साथ यूरोप के कई देशों की यात्रा की। लेकिन अक्सर इस सफर में एक कमी लगती थी।

मुझे इन यात्राओं में वह सुकून नहीं मिलता था, जो मैंने बचपन में देखा था। पति के साथ होने वाली ये यात्राएं बेहद व्यवस्थित होती थीं। लेकिन मैं तो प्रकृति की उस अनछुई खूबसूरती को महसूस करना चाहती थी, जिसमें कोई योजना नहीं होती और कुछ भी पहले से निर्धारित नहीं होता। अकेले घूमने का मौका पत्रकारिता छोड़ने के बाद तब आया, जब मैं उम्र के चौथे दशक में प्रवेश कर चुकी थी। पत्रकारिता छोड़ने के बाद मैंने ऊर्जा विभाग में इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालसिस विभाग के लिए काम करना शुरू किया। वहां मुझे काम के सिलसिले में अकेले अलग-अलग जगहों पर घूमने का मौका मिला।

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एक बार मैं अपने परिवार के साथ महाबलीपुरम घूमने गई थी। मंदिर के पास मैंने कई वाहनों में विभिन्न देशों के झंडे देखे, पूछने पर पता चला कि कुछ देशों के पर्यटक हैं, जो रोमांचक यात्राएं करते हैं। मैंने ग्रुप के लोगों से बात करके उनसे जुड़ने और उनके साथ घूमने की इच्छा जताई, तो वे मान गए। यहीं से मेरा सफर शुरू हुआ। मैंने अकेले अपनी पहली यात्रा कैलाश मानसरोवर के लिए शुरू की। उस अनुभव ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। इस दौरान मैंने महसूस किया कि अब मैं किसी चीज से नहीं डरती।

हालांकि इन रोमांचक यात्राओं में कई मौके ऐसे आए, जब मैं डर गई। ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बैरियल रीफ का अनुभव मैं कभी नहीं भूल सकती, जब एक वक्त के लिए लगा कि यह मेरी आखिरी यात्रा है। मैं लेडी इलियट आईलैंड पर पर डाइविंग के लिए गई थी। मैं कोई अनुभवी डाइवर नहीं थी, लेकिन मैं जिन फोटोग्राफर्स के साथ समुद्र की यात्रा कर रही थी, वह सभी लंबे समय से यह काम करते आ रहे थे। इंस्ट्रक्टर ने हमें बताया कि समुद्रतल 40 फीट गहरा है और तुम्हारे सिलेंडर में 50 मिनट तक के लिए ऑक्सीजन है।

ऐसे में जब मैं पानी की सतह पर आई तो देखा कि आसमान में काले बादल हैं और लहरों का प्रवाह बहुत तेज है। मुझे तैरते रहने में दिक्कत हो रही थी। लगभग एक घंटे तक किसी तरह पानी के अंदर-बाहर डुबकी लगाती रही, मुझे लगा यह मेरी आखिरी यात्रा है। मैं डूबने वाली हूं। तभी एक नाव आई, तब जाकर मेरी जान बची। एक बैगपैक और पासपोर्ट की बदौलत मैं अब तक साठ से ज्यादा देश घूम चुकी हूं।

यात्रा करने की शौकीन महिलाओं को मेरा सुझाव है कि हम अपनी सीमाएं खुद बनाते हैं। अगर आप बड़े सपने देखोगे, तो उन सभी जगहों पर जा सकते हो, जहां जाना चाहते हो। कई बार इसमें आप विफल भी होंगी, लेकिन हार मत मानो और न ही कभी रुको। यात्राएं आपको सिखाती हैं कि कैसे मुश्किल की घड़ी में अकेले आपको निपटना है।

(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।)
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