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मंजिलें और भी हैं: वेश्यावृत्ति से मुक्त लड़कियों के चेहरे मुझे ताकत देते हैं

Mon, 14 Oct 2019 03:07 AM IST
देव कश्यप त्रिवेणी आचार्य
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Triveni Acharya - फोटो : अमर उजाला
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यह वर्ष 1993 की बात है। मुझे एक प्रेस बैठक में शामिल होने के लिए कमाठीपुरा जाना पड़ा था। यह एशिया का दूसरा सबसे बड़ा रेड लाइट एरिया है। वहां पर एक फिल्म स्टार पत्रकारों से बातचीत करने वाला था। चूंकि यह इलाका पूरे मुंबई में चर्चित है, सो मुझे भी यह देखने की जिज्ञासा हुई कि आखिरकार इन बदनाम गलियों में क्या है। बैठक खत्म होने के बाद मैं वहां घूमने लगी। वहां लोगों के चेहरों को देखकर मुझे दया आने लगी।

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ऐसा लगा, जैसे मेरा दम घुट रहा हो। सेना में तकरीबन बारह वर्ष बिताने के बाद जब मेरे पति ने रिटायरमेंट लिया, तो हम गुजरात से मुंबई आ गए। मैंने एक गुजराती अखबार के लिए काम करना शुरू किया, जबकि मेरे पति ने एक छोटा व्यवसाय शुरू किया। कमाठीपुरा से घर लौटने पर मैंने अपने पति से सारी बात बताई। उन्होंने कहा कि इस विषय पर वह मुझसे बात करना चाहते थे, क्योंकि उनके एक कर्मचारी को वेश्यालय की एक लड़की से प्यार हो गया था और वह उसे छुड़ाना चाहता था और उससे शादी करना चाहता था। मैं और मेरे पति मानव तस्करी के बारे में ज्यादा नहीं जानते थे, इसलिए हमने पुलिस से बात करने के बारे में सोचा।

मैंने आयुक्त कार्यालय में बात की। उस लड़की को छुड़ाने के लिए मेरे पति खुद पुलिस के साथ गए। जब वे वहां पहुंचे, तो कई अन्य लड़कियां भी वहां से उन्हें निकालने की गुजारिश करने लगीं। इस तरह करीब तेरह-चौदह लड़कियों को वहां से पुलिस स्टेशन लाया गया। उन सबके बयान दर्ज किए गए। कुछ का अपहरण कर लिया गया था। कुछ अत्यधिक गरीबी में जी रही थीं और अच्छी नौकरी और बेहतर जीवन के वादे के चलते वेश्यावृत्ति की गिरफ्त में आई थीं। पुलिस स्टेशन पर बयान दर्ज करवाने के बाद सभी लड़कियों को हम अपने घर ले आए। उनमें से अधिकांश लड़कियां नेपाल की थीं।

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हमने नेपाल स्थित मैती नेपाल संगठन से संपर्क किया, जो लड़कियों को देह व्यापार के दलदल से निकालने का काम कर रहा था। लड़कियों को उसके बाद एक नया जीवन मिला। उस घटना के बाद मैंने और मेरे पति ने पूरी तरह से देह व्यापार में फंसी लड़कियों को बचाने के लिए काम करने का निर्णय लिया। मेरे पति ने मुझसे नौकरी करते रहने को कहा, ताकि पत्रकार के रूप में अधिक लड़कियों की मदद करने के लिए संपर्कों का उपयोग किया जा सके।

हमने अपनी सीमित क्षमता में लगभग तीन वर्षों तक काम किया। इसके बाद हमने मुंबई में मैती नेपाल की एक शाखा खोली, क्योंकि अधिकांश लड़कियां नेपाल से ही आई होती थीं। हम लड़कियों को छुड़ाते और एनजीओ को सौंप देते। इसके कुछ साल बाद रेस्क्यू फाउंडेशन का जन्म हुआ। कुछ साल बाद हमारे संगठन को एक इमारत दान में मिली, जिसे हमने आश्रय गृह बना दिया। आश्रय गृह बने कुछ ही दिन बीते थे कि मेरे पति की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। उन दिनों उन्हें बहुत धमकियां मिलती थीं, जिस कारण मैं टूट गई थी। पर इस धंधे में फंसी लड़कियों के बारे में सोचने के बाद मैंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया।

रेस्क्यू फाउंडेशन में सौ से ज्यादा सदस्य हैं, जिनमें अंडरकवर जांचकर्ताओं और मुखबिरों का एक समूह है। महाराष्ट्र सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त होने के नाते इसे सरकार से आर्थिक मदद मिलती है, जबकि थोड़ा बहुत काम करके हम स्वावलंबी होने की दिशा में काम कर रहे हैं। मेरा एक दत्तक पुत्र है, जिसकी मां ने एक वेश्यालय में उसे जन्म देने के बाद आत्महत्या कर ली थी। मेरे पति कहते थे कि, हम सभी को किसी दिन मरना होगा और इस बात पर कोई नियंत्रण नहीं होगा कि मौत कैसे होगी। मुझे इन लड़कियों के बीच सुकून मिलता है। उनके मुस्कराते चेहरे मुझे ताकत देते हैं।

(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।)
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