ड्रॉपआउट रोकने के लिए आंध्रप्रदेश की पहल शानदार
आंध्र प्रदेश ने ड्रॉपआउट रोकने के लिए विभाग, स्कूलों के साथ-साथ पंचायतों को भी जोड़ा है। इसके लिए बच्चे की मां को आर्थिक सहायता दी जाती है, ताकि वह उसे काम की बजाय उसे शिक्षा से जोड़े रखने पर जोर दें। मिड-डे मील के अलावा अन्य सहयोग भी मिलता है। ग्राम पंचायत भी इसमें सहयोग देती है। इसके अलावा फेल होने पर छात्र को उसी स्कूल में नियमित कक्षा में दाखिला दिया जाता है। इन पहलों से आंध्रप्रदेश ने छात्रों के ड्राप काफी हद तक कम कर दिया है।
बिहार और ओडिशा का ड्रॉपआउट सबसे अधिक
ओडिशा और बिहार में ड्रॉपआउट वाले छात्रों की संख्या सबसे अधिक है। ओडिशा में ड्रॉपआउट दर 39.4 से बढ़कर 49.9 प्रतिशत हो चुकी है, जबकि बिहार में ये दर 41.6 से बढ़कर 42.1 प्रतिशत तक है। इसी तरह महाराष्ट्र और गोवा में भी स्कूल छोड़ने वाले छात्रों की संख्या में बढ़त दर्ज की गई है।
10वीं और 12वीं में इतने लाख छात्र हुए थे असफल
राज्यों और सीबीएसई के स्कूलों में वर्ष 2022-23 में दसवीं में 27.50 लाख से अधिक और 12वीं कक्षा में 18.50 लाख से अधिक छात्र फेल हुए थे। स्कूलों में मनमाने नियमों के कारण ऐसे ज्यादातर छात्रों को दोबारा नियमित कक्षा में दाखिला ही नहीं मिला। स्कूलों को अपना रिजल्ट बेहतरीन की होड़ लगी हुई है। ऐसे में कमजोर छात्रों को जब स्कूल दाखिला नहीं देते हैं तो उन्हें प्राइवेट छात्र के रूप में अलग से परीक्षा देनी होती है।
इन सबके कारण छात्र घर में बैठकर खुद या प्राइवेट कोचिंग लेकर तैयारी करता है। इसके बाद करीब पांच लाख छात्र ही ओपन स्कूल बोर्ड में शामिल होकर अपनी पढ़ाई पूरी करते हैं। नियमित कक्षा में सहपाठियों के साथ पढ़ने का मौका न मिलने के कारण उनका आत्मविश्वास कमजोर होता है और वे पिछड़ते चले जाते हैं। इसी कारण फेल के बाद पास होने वाले छात्रों का आंकड़ा भी बेहद कम है।
ड्रॉपआउट में राज्यों की स्थिति
- ओडिशा 49.9 प्रतिशत
- बिहार 42.1 प्रतिशत
- मेघालय 33.5 प्रतिशत
- कर्नाटक 28.5 प्रतिशत
- आंध्र प्रदेश 28.3 प्रतिशत
- असम 28.3 प्रतिशत
- गुजरात 28.2 प्रतिशत
- तेलंगाना 27.4 प्रतिशत