यह अकादमिक नीति का मामला है
सुनवाई के दौरान जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि पर्सेंटाइल को कम नहीं करने का फैसला लिया गया है। यह अकादमिक नीति का मामला है और इसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। पीठ ने कहा कि केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा बताए गए कारणों को बाहरी और मनमाना नहीं माना जा सकता, क्योंकि डॉक्टरों को एक मरीज के जीवन से निपटना होता है और उसके लिए उनकी योग्यता को नकार या अनदेखा नहीं कर सकते हैं।
कोर्ट का दखल देना उचित नहीं होगा
सुनवाई के दौरान पीठ ने माना कि रिक्त सीटों की काउंसलिंग के लिए उम्मीदवार पर्याप्त रूप से उपलब्ध हैं, लेकिन पर्सेंटाइल को कम नहीं करने का निर्णय योग्यता से समझौता नहीं करने पर आधारित है। क्या पर्सेंटाइल को और कम किया जाना चाहिए? यह सवाल अकादमिक नीति का मामला है ओर इस पर कोर्ट का दखल देना उचित नहीं होगा। इसलिए, इन परिस्थितियों में कोर्ट के लिए इस याचिका पर विचार करना संभव नहीं है।
कुल सीटों में से 940 सीटें अभी भी खाली हैं
कट-ऑफ कम करने की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पीएस पटवालिया ने कोर्ट में दलील दी थी कि शैक्षणिक वर्ष 2021-22 के लिए कुल सीटों में से 940 सीटें अभी भी खाली हैं। उन्होंने कहा कि अगर कट ऑफ कम नहीं किया गया तो ये सीटें ऐसे समय में बेकार चली जाएंगी, जबकि देश को विशेषज्ञ डॉक्टरों की जरूरत है। उन्होंने कहा कि समय-समय पर कट-ऑफ कम की जाती रही है और मंत्रालय ने इस साल अन्य पाठ्यक्रमों के लिए कट-ऑफ कम किया है तो नीट एसएस के लिए भी की जानी चाहिए।
कट-ऑफ 50 फीसदी से कम करना उचित नहीं
वहीं, केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि कोविड के कारण शैक्षणिक वर्ष 2019-20 और 2020-21 के दौरान कट-ऑफ पर्सेंटाइल को घटा दिया गया था। पिछले शैक्षणिक वर्ष में, कट-ऑफ पर्सेंटाइल शुरू में 50 निर्धारित किया गया था, लेकिन 2019-20 के लिए इसे घटाकर 30 और 2020-21 के लिए 45 कर दिया गया था। उन्होंने कहा कि चार मई को सभी हितधारकों के साथ एक बैठक के बाद इस शैक्षणिक वर्ष के लिए 940 सीटों के लिए पर्सेंटाइल 50 के रूप में बनाए रखा गया है जो खाली रह गई हैं, क्योंकि अधिकांश सीटें वे हैं जो खाली रहती हैं।