राज्य सरकार की ओर से गुरुवार को जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि पैनल राज्य में एमबीबीएस जैसे मेडिकल कोर्सेज में प्रवेश से संबंधित आंकड़ों का अध्ययन करेगा और पिछड़े वर्गों के छात्रों के हितों की रक्षा के लिए एक महीने के भीतर आवश्यक सिफारिशें करेगा। वहीं, सरकार पैनल की सिफारिशों पर विचार करने के बाद अगली कार्रवाई शुरू करेगी।
इससे पहले पांच जून को सीएम स्टालिन ने कहा था कि तमिलनाडु का इतिहास सदैव सामाजिक न्याय को बनाए रखने के लिए जाना जाता है। इस कर्तव्य को लगातार बनाए रखने के लिए, सरकार नीट परीक्षा की विसंगतियों को दूर करने के लिए सभी कदम उठाने के लिए दृढ़ है। पैनल की घोषणा करते हुए, मुख्यमंत्री ने कहा था कि यह पैनल विश्लेषण करेगा कि क्या इस राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा का पिछड़ा वर्ग के छात्रों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है?, और यदि ऐसा है, तो समिति उपचारात्मक उपायों की सिफारिश भी करेगी। जैसे- एक वैकल्पिक प्रवेश प्रक्रिया का सुझाव देना, जिससे सभी को लाभ हो।
परीक्षा के खिलाफ सभी पार्टियां एकमत
गौरतलब है कि राज्य में नीट परीक्षा को लेकर सत्तारूढ़ द्रमुक और मुख्य विपक्षी अन्नाद्रमुक सहित लगभग सभी पार्टियां एकमत हैं। उनकी मांग है कि नीट परीक्षा के आयोजन को रद्द कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह सामाजिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है।
ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों को नहीं मिल पाता दाखिला
पार्टियों ने बार-बार कहा था कि ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले, सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले और पिछड़े वर्ग के छात्रों को मेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश नहीं मिल पाता है। एक दलित लड़की सहित कई उम्मीदवारों की आत्महत्या के बाद तमिलनाडु में नीट परीक्षा का विरोध कई गुना बढ़ गया है। इसे ध्यान में रखते हुए पिछली एआईएडीएमके सरकार ने पिछले साल अक्तूबर में नीट पास करने वाले सरकारी स्कूल के छात्रों के लिए 7.5 प्रतिशत आरक्षण की शुरुआत भी की थी।