इस अवसर पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव एवं आईआईएमसी के अध्यक्ष अपूर्व चंद्र ने कहा कि समाचारों का माध्यम पहले सिर्फ अखबार ही होते थे, लेकिन तकनीक के परिवर्तन के कारण आज सब कुछ आपके मोबाइल में सिमट गया है। आज आपके पास सूचनाओं का भंडार है, लेकिन कौन सी सूचना महत्वपूर्ण है और कौन सी नहीं, ये आम आदमी को नहीं पता चल पाता। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय इस दिशा में गंभीरता से कार्य कर रहा है, ताकि लोग सही सूचना का सही प्रयोग कर पाएं।
'इनोवेशन' पर ध्यान दें युवा : प्रो. द्विवेदी
आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में अगर कोई शब्द सबसे ज्यादा चर्चा में रहा है, तो वह 'इनोवेशन' है। किसी भी संस्थान में इनोवेशन के लिए क्षमता, ढांचा, संस्कृति और रणनीति प्रमुख तत्व हैं। आने वाले समय में वे ही कंपनियां अस्तित्व में रहेंगी, जो इनोवेशन पर आधारित सेवा देंगी। उन्होंने कहा कि पिछले एक वर्ष में आईआईएमसी ने मीडिया शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में जो नवाचार किए हैं, वह देश के अन्य मीडिया शिक्षण संस्थानों के लिए एक मिसाल हैं।
सोशल मीडिया और टीवी एक-दूसरे के पूरक : प्रसाद
'टीवी न्यूज का भविष्य' विषय पर विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और संपादक अनुराधा प्रसाद ने कहा कि जब हम अखबार पढ़ते हैं तो हमें एक दिन पुरानी खबरें वहां मिलती हैं, लेकिन टीवी और डिजिटल मीडिया में आपको एक मिनट पहले की खबर भी मिल जाती है। जिस तरह टीवी चैनल और अखबार एक दूसरे के पूरक हैं, उसी तरह सोशल मीडिया और टेलीविजन भी एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने कहा कि टीवी चैनल आने पर लोग कहा करते थे कि अखबार बंद हो जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जिन अखबारों ने अपने कंटेंट में बदलाव किया, वह आज भी मीडिया जगत में सक्रिय हैं।
सफलता का माध्यम नहीं है अंग्रेजी : सानु
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में लेखक क्रान्त सानु ने 'अंग्रेजी : समाचार की भाषा बनाम शिक्षा के माध्यम की भाषा' विषय पर विद्यार्थियों से बातचीत की। सानु ने कहा कि जब कोई अच्छी अंग्रेजी बोलता है, तो उसे पढ़ा-लिखा समझा जाता है और हिंदी बोलने वाले को कमतर समझा जाता है। जब आप विदेशों में जाते हैं, तो आपको इस वास्तविकता का पता चलता है कि सभी देशों में अंग्रेजी सफलता का माध्यम नहीं है। उन्होंने कहा कि दुनिया के 20 सबसे विकसित देशों में से सिर्फ 4 विकसित देशों में ही अंग्रेजी का उपयोग होता है और वो भी इसलिए क्योंकि ये उनकी अपनी भाषा है। बाकि 16 देशों में लोग अपनी मातृभाषा का ही इस्तेमाल करते हैं।
भारतीय संचार परंपरा में वैश्विक समन्वय का भाव : प्रो. अधिकारी
इस मौके पर काठमांडू विश्वविद्यालय के प्रो. निर्मल मणि अधिकारी ने 'भारतवर्ष की संचार परंपरा' विषय पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारत की सभी भाषाओं, वेदों और ग्रंथों में विविधता होते हुए भी पूरे विश्व के साथ उनका बेहतर तालमेल है। उन्होंने कहा कि भारत से अन्य देशों में पढ़ाई करने गए लोगों ने अंग्रेजी भाषा में पढ़ाई की और फिर उसी की नकल कर भारत की शिक्षा पद्धतियों का निर्माण किया। इस कारण भारत की शिक्षा व्यवस्था और संचार परंपरा पर अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ता गया।