मद्रास हाईकोर्ट ने गुरुवार को यह स्पष्ट किया कि उम्र में छूट आरक्षण का पर्याय नहीं है। कोर्ट ने जिला जज के पदों की भर्ती में एससी/एसटी परीक्षार्थियों की तरह उम्र में छूट की मांग कर रहे पिछड़ा वर्ग के परीक्षार्थियों की याचिका खारिज करते हुए यह बात कही।
चीफ जस्टिस एपी साही और जस्टिस सुब्रमण्यिम प्रसाद की पीठ ने कहा कि हम यह साफ करना चाहते हैं कि आरक्षण के मामले को उम्र में छूट के सवाल के साथ घालमेल नहीं किया जा सकता। पीठ ने कहा कि समाज के दबे-कुचले वर्गों को समान प्रतिनिधित्व देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 16 के तहत आरक्षण दिया गया है।
याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि उन्हें भी एससी/एसटी परीक्षार्थियों की तरह उम्र (48) में छूट दी जानी चाहिए। दरअसल तमिलनाडु सरकार ने 13 जनवरी 2019 को जिला जजों के 31 पदों पर भर्ती के लिए अधिसूचना जारी की थी और बीसी, एमबीसी, डीसी समेत एससी/एसटी परीक्षार्थियों के लिए अधिकतम उम्र 48 साल जबकि अनारक्षित श्रेणी के लिए 45 साल रखी थी। उम्र की गणना एक जुलाई 2019 से की जानी थी।
परीक्षा में बैठा कोई भी उम्मीदवार प्रारंभिक परीक्षा को पास करने के लायक न्यूनतम अंक हासिल नहीं कर सका। इसके चलते जिला जजों के पदों के चयन को कोई योग्य उम्मीदवार नहीं मिला। इसके बाद सरकार ने 12 दिसंबर 2019 को जिला जजों के 32 पदों के लिए एक अन्य अधिसूचना जारी की। इसमें बीसी, एमबीसी और डीसी के लिए अधिकतम उम्र सीमा 48 से घटा दी गई। सरकार के फैसले को चुनौती दी गई।