इस सिस्टम के अंतर्गत एक महाविद्यालय से दूसरे, एक विभाग से दूसरे, एक पाठ्यक्रम से दूसरे में क्रेडिट ट्रांसफर किए जा सकते हैं। अगर किसी कारणवश विद्यार्थी को बीच में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ती है तो उसका समय बर्बाद नहीं होगा। मल्टीपल एंट्री व एग्जिट नीति लागू की जाएगी। यानी एक साल की पढ़ाई करने पर विश्वविद्यालय द्वारा विद्यार्थी के क्रेडिट पॉइंट्स उसके खाते में जमा कर दिए जाएंगे। यदि भविष्य में वह स्नातक की पढ़ाई पूरी करना चाहता हैं, तो उसके खाते से क्रेडिट पॉइंट का इस्तेमाल कर विश्वविद्यालय उसे वहीं से पढ़ाई करने का मौका देगा, जहां से विद्यार्थी ने अपनी पढ़ाई छोड़ी थी।
अलग-अलग विषयों के क्रेडिट की अलग-अलग आयु सीमा निर्धारित की जाएगी। यूजीसी द्वारा क्रेडिट्स की आयुसीमा आठ साल रखने का प्रस्ताव दिया गया है। यानी जिस दिन विद्यार्थी के अकाउंट में यह क्रेडिट्स ट्रांसफर किए जाएंगे उसके आठ साल बाद तक वे इसका इस्तेमाल कर सकेंगे। आयु सीमा समाप्त हो जाने के उपरांत इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा।
इंटर्नशिप या नौकरी में भी देखे जाएंगे क्रैडिट पॉइन्ट्स
अभी तक नौकरी या इंटर्नशिप पाने के लिए डिग्री में फर्स्ट/ सेकेंड / थर्ड डिविजन से पास होना अनिवार्य था। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि क्रेडिट सिस्टम के लागू हो जाने के बाद नौकरियों और इंटर्नशिप में डिग्री के साथ-साथ क्रेडिट पॉइंट्स भी देखें जाएंगे।
द वर्ल्ड बैंक के द एकेडमिक क्रेडिट सिस्टम इन हायर एजुकेशन के हिसाब से हाय क्वालिटी मैनपावर की मांग को पूरा करने के लिए इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) और कुछ विश्वविद्यालयों ने 1974 में स्नातक और स्नातकोत्तर ट्रेनिंग में क्रेडिट सिस्टम को लागू किया था। इस सिस्टम को अमेरिकन स्कीम से लिया गया था, लेकिन इसमें भारतीय सिस्टम के हिसाब से कुछ बदलाव किए गए थे।
विदेशों में लागू है क्रेडिट सिस्टम
- ऑस्ट्रेलिया में ये स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में लागू किया गया है।
- अमेरिका में सेमेस्टर क्रेडिट आवर्स स्कीम लागू है।
- यूरोप के ज्यादातर देशों में क्रेडिट सिस्टम लागू है।