लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पांच साल के अंतराल के बाद होने जा रहे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में मुख्य मुकाबला राष्ट्रवादी और वामदलों के गठबंधन के बीच है। दोनों दलों ने जीत हासिल करने के लिए पूरी संजीदगी से अपने उम्मीदवारों का जातीय व क्षेत्रीय समीकरण के आधार पर चयन किया है।
एबीवीपी ने साल 1997 में नक्सली हमले में मारे गए सीताराम अजमेरा के बेटे उमेश चंद्र अजमेरा को अध्यक्ष पद का प्रत्याशी बनाया है। उमेश नक्सल प्रभावित परिवार के अलावा आदिवासी जनजातीय क्षेत्र और दलित भी हैं। जबकि वामदल गठबंधन ने 25 साल के बाद दलित चेहरे पर दांव लगाते हुए धनंजय को अध्यक्ष पद के लिए चुना है।
लाल दुर्ग कहे जाने वाले जेएनयू छात्रसंघ चुनाव 2015 में 14 साल के बाद एबीवीपी ने संयुक्त सचिव पद जीतकर अच्छी वापसी की थी। एबीवीपी के सौरभ शर्मा ने आइसा के उम्मीदवार को महज 28 वोट से हराया था। उसके बाद भगवा की स्थिति में लगातार सुधार हुआ। बेशक सेंट्रल पैनल की सीट पर कोई जीत हासिल नहीं कर सकें, लेकिन काउंसलर पद जीतने के साथ अपने वोट प्रतिशत में लगातार सुधार किया है। छात्रों के अधिकारों के लिए एबीवीपी के कार्यकर्ता लगातार आवाज उठाते हैं। इसीलिए मतदाता भी उनके लिए मतदान करते आ रहे हैं।
वोट प्रतिशत बढ़ने से लेफ्ट गठबंधन में आया
एबीवीपी के वोट बैंक में लगातार बढ़ोतरी होने के कारण कभी वामदलों के छात्र संगठन आइसा, एसएफआई, डीएसएफ, एआईएसएफ कभी अलग-अलग चुनाव लड़ते थे। लेकिन साल 2016 के बाद वामदलों के छात्र संगठनों ने गठबंधन में आते हुए एक साथ सेंट्रल पैनल से लेकर अन्य काउंसलर पदों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया, जोकि आजतक जारी है। हालांकि अभी भी एबीवीपी के वोट बैंक में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।
शोध छात्रों पर भराेसा
वामदल के गठबंधन और दक्षिणपंथी संगठनों ने सेंट्रल पैनल के चारों अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव व संयुक्त सचिव पद के लिए पीएचडी शोधार्थियों को अपना प्रत्याशी बनाया है। छात्र संगठनों ने स्नातक, स्नातकोत्तर प्रोग्राम के छात्रों को अपना प्रत्याशी बनाने के बजाय विश्वविद्यालय के वरिष्ठ छात्रों को प्रत्याशी बनाया है।