टीम को ऐसे समझाएं
कभी-कभी हमारा दिमाग नए फैसलों को पुराने अनुभवों से जोड़कर तुरंत यह अंदाजा लगा लेता है कि क्या सही है और क्या गलत। ऐसे में, आप खुद से पूछ सकते हैं कि यह मुझे किस बात की याद दिला रहा है? हो सकता है कि टीम किसी जोखिम को नजरअंदाज कर रही हो। जब आप अपनी बात रखें, तो उसे सरल तरीके से कहें जैसे, यह पहले जैसा लग रहा है या ऐसा हमने पहले भी देखा है। इससे आपकी बात स्पष्ट होती है।
सवाल पूछें
अगर आपको किसी विचार से असहमति है या कोई संदेह है, तो तुरंत कुछ कहने के बजाय थोड़ा समय लें। स्पष्टीकरण वाले सवाल पूछें और जानकारी जुटाएं, जैसे-अपनी राय देने से पहले कहें कि मुझे समय-सीमा के बारे में कुछ शक है। हमने छह महीने कैसे तय किए? या मैं यह समझना चाहता हूं कि इस योजना के पीछे क्या सोच थी? अक्सर उनका जवाब आपकी सोच को साफ कर देगा। इस तरह आप जिज्ञासु होकर सही निर्णय लेने में मदद कर सकते हैं।
बातों को उदाहरणों से बताएं
अक्सर लोग संख्याओं को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं, क्योंकि वे सटीक और भरोसेमंद लगती हैं। लेकिन हर चीज को नंबर में नहीं मापा जा सकता। बातचीत और अवलोकन से मिली जानकारी भी उतनी ही जरूरी होती है और इसी से अंतर्ज्ञान बनता है। जब आप अपनी बात कहानी या उदाहरण के साथ बताते हैं, तो लोग उसे बेहतर तरीके से समझते हैं। इसलिए सिर्फ यह कहने के बजाय कि मुझे लगता है, यह उत्पाद सफल होगा, आप उदाहरण दें कि जैसे-हमने कई लोगों से बात की और ज्यादातर ने इसी समस्या के बारे में बताया। इससे आपकी बात ज्यादा भरोसेमंद बनती है।
पहले परीक्षण करें
कभी-कभी बिना सबूत के अंतर्ज्ञान पर भरोसा करना जोखिम भरा होता है, इसलिए छोटे परीक्षण या प्रोजेक्ट से शुरुआत करें। इससे जोखिम कम होता है और लोग आसानी से सहमत होते हैं। आप कह सकते हैं कि मुझे लगता है कि यह मौका अच्छा है, क्यों न एक छोटे प्रोजेक्ट से शुरुआत करें? इससे आपका अनुभव और सोच दूसरों को साफ दिखाई देगी।