आगामी पांच सितंबर को पूरा देश शिक्षक दिवस मनाने जा रहा है। इस दिन स्कूल-कॉलेजों में छात्र शिक्षकों के प्रति अपने-अपने तरीके से सम्मान प्रकट करेंगे। जीवन में गुरु की अहमियत कभी कम नहीं होती। इसे इस बात से समझा जा सकता है कि जब सन 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पता लगा कि उनके गुरु दयानंद गिरी की तबीयत खराब चल रही है, तो वह बिना देर किए उनसे मिलने पहुंच गए।
यह उस गुरु के प्रति लगाव ही था, जो प्रधानमंत्री जैसे पद पर काबिज होते हुए भी उन्हें उनसे दूर न रख सका। शिक्षक दिवस के दिन वेतन मांगने के बदले मिली पुलिस की लाठियों से समझा जा सकता है कि हमारे सिस्टम के लिए एक शिक्षक कितना महत्व रखता है, लेकिन सचमुच हम शिक्षकों का कितना ध्यान रखते हैं इसको इस तरह देखिए। कहीं स्कूली शिक्षक जनगणना करने में लगा दिए जाते हैं, तो कहीं सरकार के किसी सर्वे के लिए गली-गली घूमकर आंकड़े जुटाने का काम कर रहे होते हैं।
इन सबके बीच उन पर स्कूल का वार्षिक परीक्षा परिणाम भी सुधारने की जिम्मेदारी होती है। देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में इस समय शिक्षकों के करीब 33 फीसदी पद खाली पड़े हैं। आईआईटी जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों तक में अध्यापकों के 34 फीसदी पद खाली हैं। अगर भारत को हमें सही मायनों में विश्वगुरु बनाना है, तो जरूरी है कि हम सबसे पहले हम गुरु के मन की बात को समझें, जिसके भरोसे हम ये सपना देख रहे हैं।