नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए...., लकड़ी की काठी, काठी पर घोड़ा..., नन्हा-मुन्ना राही हूं.... जैसे गानों की धुन पर उछल-कूद करते छोटे-छोटे बच्चे। रंग-बिरंगे हॉल के अंदर की बड़ी स्क्रीन में चलता कार्टून। यह कोई पिकनिक स्पॉट नहीं, केंद्र सरकार का एक सरकारी स्कूल है। यहां तीन से पांच साल के बच्चों की कक्षाएं लगी हैं। इसमें न कापी-किताब-है, न बस्ते का बोझ। पारंपरिक डेस्क-बेंच की यहां नहीं हैं। इसकी जगह लकड़ी के घोड़े, गोल आकार की बड़ी मेज और छोटी-छोटी कुर्सियां हैं। क्लास रूम में इनको इस तरह लगाया गया है कि बच्चों की उछल-कूछ में कोई परेशानी न हो।
दरअसल, शिक्षा मंत्रालय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत 20 अक्तूबर को 49 केंद्रीय विद्यालयों (केवी) में बालवाटिका शुरू किया है। यहां टाइम-टेबल व पढ़ाने का तरीका सरकार की उच्चस्तरीय समिति द्वारा तैयार बुनियादी शिक्षा पाठ्यक्रम के मसौदे पर आधारित है, जिसमें स्कूल बैग और किताब शामिल नहीं हैं।
देश में पहली बार सरकारी स्कूलों में प्रीस्कूल, नर्सरी, लॉअर केजी, अपर प्रेप, प्री-प्राइमरी, केजी या अपर केजी की जगह तीन से पांच साल के ऊपर तक के बच्चों के लिए बालवाटिका एक, बालवाटिका दो और बालवाटिका तीन शुरू हुई हैं। फिलहाल 49 सरकारी स्कूलों से शुरू सफर अगले शैक्षणिक सत्र 2023-24 में देशभर के सीबीएसई बोर्ड से मान्यता प्राप्त स्कूलों, राज्यों के सरकारी स्कूलों में शुरू होना है। एनसीईआरटी पहली बार इन कक्षाओं के छात्रों के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम तैयार करेगा। अभी तक देश में पहली से 12वीं कक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम तैयार होता है। लेकिन अब नन्हे-मुन्ने भी राष्ट्रीय पाठ़्यक्रम से पढ़ाई करेंगे।
केंद्रीय विद्यालय, एयरफोर्स स्टेशन, अर्जनगढ़, दिल्ली
बालवाटिका एक, दो और तीन..... में खेल-खेल में जमा, घटाव, रंग, चीजों की पहचान
बड़ा सा कमरा और पार्क से खिड़कियों से आती ठंडी हवा के झौंके, उसमें फूल, फल, जानवर, खिलौने को उकेरती रंग-बिरंगी दीवारें। खेल-खेल में मस्ती के साथ जमा, घटाव, जानवरों के नाम, रंगों की पहचान, सामान्य ज्ञान, बात करने, चलने का तरीका और भाषा सीखते नन्हे-मुन्ने। वर्दी और बैग की कोई बाध्यता नहीं, टीचर से दोस्तों के साथ जिंदगी के कदम भरने की सीख और नींब लगाने का एक अनोखा अंदाज। यह नजारा केंद्र सरकार के सरकारी स्कूल यानी केंद्रीय विद्यालय एयरफोस स्टेशन अर्जनगढ़, दिल्ली का था।
यहां राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत बालवाटिका स्कूल में तीन से पांच साल से ऊपर तक के नन्हे-मुन्ने अपनी तोतली आवाज में जिंदगी की पहली सीढ़ी अपनी उम्र के आधार पर अलग-अलग टाइम टेबल से खेल-खेल मेें जमा, घटाव, रंग और चीजों की पहचान करना सीख रहे थे। प्रति बालवाटिका 40 बच्चे, दो टीचर, एक हेल्पर एक मां की तरह पहली बार घर से बाहर जीवन की पहली सीढ़ी चढ़ने का प्रयास करते नन्हे-मुन्नों को समय का महत्व और सुबह उठकर सबसे पहले के क्या करना चाहिए की प्रक्रिया समझाती हैं। इसके बाद क्ले मॉडलिंग से जानवरों, ग्लास, बोत्तल, स्पून, ट्रे की पहचान तो टेडी वियर से तोता, मोर, शेर ... की कहानी से सीख मिलती है।