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Safalta Master Class Session : आप क्या ग्रहण कर रहे हैं इससे तय होता है आपका टेस्ट : अरविंद जोशी

Sun, 22 Oct 2023 09:24 PM IST
Pushpendra Mishra Media Solution Initiative

सार

Master Class Topic, Importance of Taste In Advertising & Marketing, Guest Speaker: Arvind Joshi, Founder Adgini, Delhi Chronicles, White Lotus Comms.

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मास्टर क्लास सेशन Importance of Taste In Advertising and Marketing - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सफलता डॉट कॉम द्वारा इंपोर्टेंस ऑफ टेस्ट इन एडवरटाइजिंग एंड मार्केटिंग विषय पर आयोजित किए गए मास्टर क्लास सत्र में एडगिनी फाउंडर अरविंद जोशी ने कहा कि कई बार हम किसी सुर्ख रंग की कमीज पहने व्यक्ति को देखकर ये कह देते हैं कि ये कोई टेस्ट है जिसमें हमारा मतलब होता है कि शायद इस आदमी को ये पता ही नहीं है कि इस सार्वजनिक जगह पर कौन सा रंग पहनना उचित है जो लोगों को अच्छा लगेगा। यानी वो रंग जो आंख को अखरे नहीं। यानी उस अमुक व्यक्ति को रंग का कोई आईडिया नहीं है कि कौन सा रंग कहां पहनना चाहिए। ये ही उसका टेस्ट है। टेस्ट वो है जिसमें बिना किसी किताब को खोले आपको ये पता चल जाए कि अच्छा है या बुरा। जैसे ब्लैक पेंट पर सफेद बेल्ट पहनना अच्छा है या बुरा। सवाल ये है कि क्या ये टेस्ट बदल सकता है। तो टेस्ट कई तरह के होते हैं। कुछ लोग होते हैं जो उग्र स्वभाव के होते हैं। जो उनका नेचर है वो नहीं बदलता। क्योंकि ये उनकी जीन्स के अंदर है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि मान लो आप अपने घर के शीशे के सामने खड़े होकर बालों में कंघी कर रहे हैं और अपने को देख रहे हैं और जज कर रहे हैं खुद को वो समाज ही जज कर रहा है आपको। क्योंकि समाज बाहर के साथ साथ घर के अंदर भी है आपके दिमाग के भीतर। जो सालों साल आपने समाज से समझा है देखा है उन सब कसौटियों को आप खुद पर लागू कर रहे हो।

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रंग के उदाहरण से समझाया कैसे बदलता है लोगों का टेस्ट 

अरविंद जोशी ने काले रंग को लेकर विशेष बात कही। एक उदाहरण से उन्होंने इसे समझाते हुए कहा कि मान लो कोई लड़का या लड़की का रंग गोरा नहीं है स्यामल है या काला है। तो वो जब भी अपना चेहरा शीशे में देखेंगे उन्हें लगेगा कि ये काला रंग कम कैसे करूं। थोड़ा और गोरा कैसे हो सकता हूं। तो वो लड़का और लड़की दोनों अपने ऊपर टेस्ट को लागू कर रहे हैं जिसे उन्होंने अपने परिवार और समाज से पाया है। क्योंकि उन्होंने जो भी फिल्म देखी, हीरो हीरोइन तो गोरे ही होते हैं। फिल्म में कमेडियन या विलियन काले होते हैं। लेकिन यही व्यक्ति जब किशोरावस्था में बॉलीवुड फिल्मों के बजाय विश्व सिनेमा देखने लग जाते हैं। तब वो डेजल वाशिंग्टन को देखते हैं। विल स्मिथ को देखते हैं तो उनके अंदर दिमाग के अंदर टेस्ट को लेकर बनी अवस्था बदलती है। क्योंकि काले रंग के हीरो या हीरोइन को देखने के बाद आपको लगता है काला व्यक्ति भी नायक बन सकता है। इसके बाद जब वो स्यामल रंग का लड़का शीशे के सामने जाता है तो हॉलीवुड के नायक को सामने रखकर कंघी करता है कि वो भी तो काले रंग के हैं लेकिन हीरो हैं तो मैं कुछ बड़ा क्यों नहीं कर सकता। यानी उस लड़के का रंग विल स्मिथ जैसा है। इसी तरह चीजों को लेकर जो आपके अंदर टेस्ट का बदलाव होता है वो इससे तय होता कि आप कंज्यूम क्या कर रहे हैं। अगर आप स्थानीय चीजों को ग्रहण कर रहे हैं सीख रहे हैं देख रहे हैं समझ रहे हैं। तो आपका टेस्ट भी उन लोकल चीजों पर आधारित होगा। अरविंद ने कहा कि किसी भी फील्ड में टेस्ट का जो महत्व है वह यह है कि किसी भी कमर्शियल प्रोडक्ट के मैसेज को आप एक चिन्हित समुदाय के लोगों तक पहुंचाते हैं, वो मैसेज इतना रुचिकर हो कि लोग उस मैसेज को लेकर आगे बढ़ जाएं।

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मैगी की टैगलाइन कैसे बनी, बस दो मिनट  

जैसे 80s के दशक से हम एक मैगी का एड देख रहे हैं जो है बस दो मिनट, हम सबसे अपने घर में ये देखा कि जैसे ही मां से हम कहते हैं मां भूख लगी है मां कहती है बस दो मिनट। क्योंकि मां पर भरोसा है मां ने कहा है दो मिनट तो भोजन दो मिनट में मिल जाएगा। यानी बचपन या उससे आगे जब भी मां के सामने हम परेशानी लेकर जाते हैं उनके पास उसका सही जवाब होता है। ये भाव है जिसे मैगी न उस समय उठाकर अपनी टैग लाइन बना लिया। आपने पढ़ा कि वो सिर्फ एक क्वेश्चन और आंसर का छोटा सा एड है। मां भूख लगी है, मां ने कहा, बस दो मिनट। मैगी ने इस छोटे से प्रश्न और उत्तर में एक सशक्त तरीके से मां की भाषा बना दिया। 90 के दशक में जैसे जैसे लिब्रलाइजेशन बढ़ा लोग पढ़ने के लिए, नौकरियों के लिए अपने घरों से दूर जाने लगे। जब हॉस्टल्स में किराए के घरों में 16 से 25 साल के युवा आकर रहने लगे तो मैगी खरीदने वाले एक नए टारगेट ऑडियंस का निर्माण हुआ।ये वो तबका था जो मां के साथ रहता था अब अकेला रहता है। अब मैगी के एड बदल गए हैं अब कॉलेज सीन दिखाए जाते हैं। उन्होंने युवाओं से कहा कि सिंडलर लिस्ट फिल्म देखने के लिए कहा, साथ ही कहा कि अगर आप वैश्विक चीजों को नहीं समझेंगे तो आपके कंटेंट में टेस्ट बेहतर नहीं होगा। आपके कंटेंट में लोकल टेस्ट रहेगा। उन्होंने युवाओं से कहा कि मान लो आप किसी ब्रांड के लिए एड बना रहे हैं तो उसमें टेस्ट कैसे काम करेगा। आप सबसे पहले ये सोचो जो मैसेज आप तैयार कर रहे हैं वो किस ब्रांड की तरफ से जा रहा है।

एड बनाने से पहले जाने टारगेट ऑडियंस

जैसे:- लाइफ ब्वाय ब्रांड है उसके लिए गरीब तबका ख्याल में आता है। जो महलों में रह रहा है, जो क्लासी आदमी है उसके लिए नहीं बना। तो जिसने भी ये लाइफ ब्वाय का एड बना तो बनाने वाले ने नहाने के प्रोसेस में गरीब आदमी के लिए अच्छा क्या होता है, आपके पूरे दाग धुल जाएं। कीमत में सस्ता हो। आपको लेबर क्लास को प्रजेंट करना है। कम साबुन खर्च होता है। जैसे मारूति के एड में सिख बच्चा कहता है कि पप्पा पेट्रोल खतम ही नहीं होंदा। लेकिन अगर आपने बीएमडब्ल्यू बनाया और आपने उसमें ये लिख दिया कि माइलेज इतना देती है। तो बीएमडब्ल्यू खरीदने वाला उस गाड़ी को नहीं खरीदेगा। उसे इंसल्ट लगेगा। कि ये मुझे एवरेज की बात बता रही है। जब भी कोई व्यक्ति आपके पास अपने ब्रांड को लेकर आपके पास आता है तो आपको उस ब्रांड से आप ये पूछो कि इस उत्पाद को बनाना गया है। इसको खरीदने वाला कौन है, कितने रुपये का आप इसे बेचने वाले हैं। अगर उसे खरीदने वाले लोग गोविंदा को पसंद करते हैं तो आपको उस एड को गोविंदा बनाकर बेचना होगा। अगर वो दिलीप कुमार को देखने वाले हैं तो दिलीप कुमार को ध्यान में रखकर आपका एड तैयार होगा। आपको एड बनाने से पहले सौंदर्यबोध होना चाहिए।

सफलता के साथ बनाएं अपना कॅरिअर 

देश की जानी - मानी ऐडटेक कंपनी सफलता ने युवाओं की मदद के लिए कई प्रोफेशनल और स्किल ओरिएंटेड शॉर्ट और लॉन्ग टर्म कोर्सेज की शुरुआत की है जहां से आप घर बैठे खुद को एक किसी फील्ड का प्रोफेशनल बना सकते हैं। यहां डिजिटल मार्केटिंग के अलावा भी कई कोर्स मौजूद हैं। इतना ही नहीं सरकारी नौकरी का सपना देख रहे युवाओं के लिए भी सफलता पर लगभग सभी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोर्सेज हैं। यहां से पढ़कर सैकड़ों युवाओं ने सरकारी और प्राइवेट सेक्टर में शानदार नौकरियां हासिल की हैं तो फिर देर किस बात की आज ही सफलता से जुड़ें और अपना शानदार कॅरिअर बनाएं। आप अपने फोन में Safalta App डाउनलोड करके भी इन कोर्सेज से जुड़ सकते हैं।

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