इसके खिलाफ छात्र कृष चोर्डिया ने बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान जस्टिस गौतम पटेल और जस्टिस नीला गोखले की खंडपीठ ने सात जून को अपने आदेश में कहा कि उसे कोई तर्क नजर नहीं आता कि 10वीं कक्षा के छात्र जो विज्ञान विषय नहीं चुनते हैं, उन्हें बाद में साइंस स्ट्रीम में प्रवेश क्यों नहीं देना चाहिए।
अदालत ने कहा कि एसएससी और आईसीएसई स्कूलों में विषयों का चुनाव 10वीं कक्षा में नहीं किया जाता है, बल्कि कक्षा आठवीं या नौवीं के आसपास कम से कम एक या दो साल पहले किया जाता है। यह उम्मीद करना निश्चित रूप से अनुचित है कि 14 साल के बच्चे का निर्णय सही होगा जो उसके पूरे भविष्य का निर्धारक होगा।
बंबई उच्च न्यायालय ने आगे कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के अनुसार, पूरे पैटर्न को बदलने का प्रस्ताव है। अदालत ने कहा, विज्ञान-कला-वाणिज्य के पुराने ट्रिफेक्टा को दूर किया जाना चाहिए और यह सही भी है। अब शिक्षा नीति का जोर क्षमता की पहचान करने और उसे पोषित करने और सीखने के लचीले विकल्प प्रदान करने पर है।
अदालत ने कहा कि हम यह पूछने के लिए मजबूर हैं कि राज्य बोर्ड का उद्देश्य क्या होना चाहिए? छात्रों की सहायता करना और शिक्षा के अवसर प्रदान करना और प्रोत्साहित करना या उन्हें गति देने के नए तरीके खोजना?
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि राज्य बोर्ड और कॉलेज को यह सुनिश्चित करने के लिए समन्वय करना चाहिए था कि प्रवेश दिए जाने से पहले क्या चोर्डिया को सूचित किया गया था कि वह किसी भी कारण से अपात्र था। अदालत ने कहा कि चोर्डिया ने 11वीं और 12वीं कक्षा पूरी कर ली है, दोनों में औसत से बेहतर प्रदर्शन किया है और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी प्रवेश परीक्षाओं में शामिल हुआ है।
अदालत ने कहा, अब उसे बताया जा रहा है कि वह विज्ञान पढ़ने में अक्षम है क्योंकि उसने तीन साल पहले 10वीं कक्षा में विज्ञान नहीं किया था। यह हास्यास्पद लगता है। इसलिए, याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत दी जाती है और बोर्ड उसकी कक्षा 12वीं की मार्कशीट को अंतिम सुनवाई और याचिका के निस्तारण के लिए जारी करे।