मेरा नाम आदित्य है। मैं 17 साल का हूं और मेरा परिवार दिल्ली के राजेंद्र नगर में रहता है। एक महीने पहले ही यहां आया हूं। खरकिव यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिला। यहां की स्थिति बहुत भयानक है। कल और आज में एक दम तस्वीर ही बदल गई है। आसमान में धुआं फैला है और सड़क पर सेना ही सेना है। बाहर सब कुछ बंद है। अंदर हम अस्पताल के ठीक नीचे बने बंकर में पड़े हैं। यहां थोड़ा बहुत नेटवर्क आता है। जैसे ही सायरन बजता है हम लाइट बंद कर बंकर में अंदर की ओर घुस जाते हैं। सुबह मम्मी से बात हुई, बहुत घबरा रही थीं फिर मैंने उन्हें अपना फोटो भी भेजा। बाहर के हालात ऐसे हैं कि धमाके और गोलीबारी की आवाज से दिल बैठा जा रहा है।
आप यकीन नहीं मानेंगे, रात को माइनस पांच डिग्री तापमान था। मेरे पास एक ही कंबल था और उससे भी ठंड नहीं जा रही थी। रात भर मैं बंकर में ही बैठा रहा। ऊपर चीख-पुकार की आवाजें आ रही थीं। मेरे साथ दिल्ली के 11 और छात्र हैं, जो इसी बंकर में है। रात भर हम में से किसी को वॉशरूम नहीं जाने दिया गया। हमारे पास खाना पहले से कम था और अब थोड़ा बहुत ही बचा है। सुबह मुझे एक ब्रेड दिया। ऊपर जब भी कोई बम गिरता है तो नीचे बंकर में धूल उड़ रही है। मुझे अस्थमा होने की वजह से और ज्यादा परेशानी हो रही है। कभी मास्क लगा लेता हूं तो कभी धूल से बचने के लिए किसी खिड़की की तरफ हवा लेने पहुंच जाता हूं। कल पूरी रात मैंने यही सब किया।
मेरे पिता की एक साल पहले कोरोना से मौत हुई। वे दिल्ली में ही एक प्राइवेट अस्पताल में काम करते थे। ड्यूटी के दौरान कोविड होने से उनकी हालत खराब हुई और फिर चौथे दिन उनकी मौत हो गई थी। अभी एडमिशन मिलने पर नाना-नानी से काफी सपोर्ट किया और मुझे लोन लेकर यहां पढ़ने भेज दिया। मेरे पास अभी इतने रुपये भी नहीं कि मैं अपना टिकट करवा सकूं। लेकिन मेरे साथ वालों ने टिकट कराए थे और फ्लाइट लेने से पहले ही हमला हो गया। अब हम सब दो दिन से जमीन के नीचे ही मिट्टी और ईटों के बीच पड़े हुए हैं।
(यूक्रेन की राजधानी कीव से आदित्य अग्रवाल ने जैसा अमर उजाला संवाददाता परीक्षित निर्भय को बताया)