याचिकाकर्ता का दावा था कि चौथे स्पॉट राउंड के बाद खाली 98 सीटों को विश्वविद्यालय ने जानबूझकर छिपाया
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि विश्वविद्यालयों को रिक्त सीटें होने के बावजूद प्रवेश के लिए नई काउंसलिंग का दौर आयोजित करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि एक बार प्रवेश प्रक्रिया समाप्त हो जाने के बाद उसे दोबारा शुरू करना न केवल असंगत होगा, बल्कि यह कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया बन जाएगी। मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने यह टिप्पणी उस याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें एक अभ्यर्थी ने दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) को सीयूईटी-पीजी 2025 के तहत स्पॉट राउंड-पांच काउंसलिंग आयोजित करने का निर्देश देने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता ओबीसी श्रेणी से था। उसने दावा किया कि चौथे स्पॉट राउंड के बाद भी 98 सीटें खाली थीं, लेकिन विश्वविद्यालय ने उन्हें जानबूझकर छिपाया। उसने यह भी कहा कि डीयू ने ओबीसी सीटों की रिक्तियों का खुलासा नहीं किया और उसके आवेदन पर विचार नहीं किया गया। हालांकि अदालत ने पाया कि अभ्यर्थी ने सीयूईटी-पीजी में 151 अंक प्राप्त किए थे, जबकि ओबीसी श्रेणी में स्पॉट राउंड-चार के लिए कट-ऑफ 155 अंक था। इस आधार पर न्यायालय ने कहा कि अभ्यर्थी को प्रवेश का कोई अधिकार नहीं बनता।
पीठ ने कहा कि यदि अदालत हर बार विश्वविद्यालय को नई काउंसलिंग के लिए मजबूर करे, तो कोई भी अभ्यर्थी, जो कट-ऑफ से नीचे है। अदालत में जाकर प्रक्रिया को बार-बार खुलवाने की मांग करेगा। इससे प्रवेश प्रक्रिया कभी समाप्त ही नहीं होगी। विश्वविद्यालय की ओर से पेश वकील ने भी कहा कि भले ही कुछ सीटें खाली रह जाएं, लेकिन यह अपने आप में नया राउंड आयोजित करने का पर्याप्त कारण नहीं है। अदालत ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि प्रवेश प्रक्रिया 30 सितंबर को समाप्त हो चुकी थी और अब किसी भी प्रकार का नया काउंसलिंग दौर आयोजित करने की कोई आवश्यकता नहीं है।