मेज पर तिरंगा, ग्लोब, लालबत्ती लगी एंबेसडर, अशोक स्तंभ चक्र... प्रतिकृति ही सही, सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने वाले ‘एस्परेंट’ मतलब प्रतियोगियों की ठसक मुखर्जी नगर के तंग कमरों में दिख जाती है।
आईएएस बनने से पहले ही वह अपने सपनों की सेवा में जाने की तैयारी प्रतिकृतियों के सहारे ही पूरी कर लेते हैं। नजर हमेशा लक्ष्य पर इस कदर दिखती है कि दीवारें भी सूत्र वाक्यों व कठिन आंकड़ों से भरे पन्नों से ढंक जाती हैं। दुनिया का मानचित्र भी दीवार की शोभा बढ़ाता है।
हैरानी की बात नहीं, इनमें से कई प्रतियोगी अपनी मंजिल पाने में कामयाब भी होते हैं। इन्हीं तंग कमरों से बड़ी संख्या में हर साल नौकरशाह निकलते हैं। तभी इसे सिविल सेवा की तैयारी करने वालों का मक्का बोला जाता है। छोटे-छोटे कमरों में राष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय सियासत, अर्थनीति, समाज नीति समेत दूसरे मसलों पर संजीदा चर्चाएं होती हैं। इस वक्त यूक्रेन संकट पर चर्चा आम है। रूसी के आक्रमण और यूक्रेन के प्रतिरोध से वैश्विक राजनीति के बदलते आयामों पर गंभीर विमर्श छात्रों के बीच सुना जा सकता है।
प्रतियोगियों की मांग पूरा करने वाली दुकानें भी मुखर्जी नगर में दिख जाती हैं। फुटपाथ पर एक हजार रुपये के अंदर में ही एंबेसडर से लेकर तिरंगा तक सब मिल जाता है। ऐसे ही एक दुकानदार रामदीन ने बताया कि युवाओं की मनपसंद सारी एसेसरीज उनके पास है। खासतौर से नए आने वाले बच्चों में, जो अपने कमरे में जमने के साथ इन सब चीजों को अपनी मेज पर सजा लेते हैं। रामदीन करीब 20 साल से दुकानदारी कर रहे हैं। उनका मानना है कि इनमें से बहुत से आईएएस बन भी जाते हैं। जब कभी उनका वापस लौटना होता है तो वह मुलाकात कर हाल-चाल पूछते हैं। इस सबसे बहुत अच्छा लगता है।
छोटे से कमरे में बसा रहता है पूरा संसार : वैसे तो दिल्ली में देशभर के छात्र पढ़ाई, रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए आते हैं, लेकिन नार्थ दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुछ इलाके ऐसे भी हैं जहां साल भर विभिन्न परीक्षाओं की तैयारियों में जुटे छात्रों का मेला लगा रहता है। प्रतियोगी परीक्षाओं का जुनून इस कदर छाया रहता है कि वह छोटे से कमरे में अपने पूरे संसार को बसाए रखते हैं। वही कमरा उनका लाइब्रेरी होता है तो वहीं रसोई घर। मनोरंजन के लिए भी चार-पांच बच्चे इकट्ठे होकर पार्टी कर लेते हैं और त्योहारों को मना लेते हैं।
हर साल करीब 20 से 25 हजार युवा आते हैं : मुखर्जी नगर इलाका आईएएस तैयारी करने वाले छात्रों का हब है। यहां हर साल 20 से 25 हजार छात्र तैयारी करने पहुंचते हैं। इतने ही छात्र दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिले लेते हैं। यूपीएससी की तैयारी कराने वाले कोचिंग इंस्टीट्यूट की भी इस इलाके में भरमार है। बैंकिंग व अन्य स्नातकोत्तर के बाद की प्रतियोगी परीक्षाओं का भी खूब क्रेज है।
एक ही बिल्डिंग में मिनी भारत का नजारा
इस इलाके में चार-चार मंजिल मकान बने हुए हैं। इसी तरह कई पीजी भी हैं। इन मकानों व पीजी में 25-40 छात्र रहते हैं। कोई मणिपुर समेत पूर्वोत्तर भारत से आकर पढ़ाई करता है तो कोई केरल समेत अन्य दक्षिणी भारत से। उत्तर भारत के यूपी, बिहार, हरियाणा राजस्थान से भी बड़ी संख्या में छात्र होते हैं। इस पूरे घर का नजारा मिनी भारत की संस्कृति की झलक देता है।
बदइंतजामी से रहते हैं परेशान
छात्रों को कमरों का किराया भी ज्यादा देना होता है। बिजली शुल्क प्रति यूनिट दस रुपये तक मकान मालिक वसूल लेते हैं। पानी के लिए भी दो-तीन सौ रुपये प्रतिमाह वसूला जाता है। छोटे कमरे के लिए भी कम से कम 10 हजार रुपये देने पड़ते हैं। दो लोग साथ नहीं रहे तो किराया देना तक मुश्किल है। -
लवली कुमारी, छात्रा
कमरे में धूप है और न हवा
इस इलाके में ऐसे-ऐसे कमरे में रहकर पढ़ाई करनी पड़ती है जहां सूर्य की किरण कभी पहुंचती ही नहीं है। इसके लिए पार्क में जाने की मजबूरी होती है। इसी तरह सिर्फ एक तरफ से खुले होने के कारण हवा तक नहीं पहुंचता। खाने पर भी इन दिनों महंगाई की मार है। किराएदार ऊंची कीमत वसूलते हैं। -
ललित मोहन, छात्र