थैलेसीमिक्स इंडिया की सचिव शोभा तुली ने थैलेसीमिया रोगियों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार पर जोर देते हुए कहा कि इस तरह के क्लीनिक देश के अलग-अलग हिस्सों में शुरू होने चाहिए ताकि लोगों को समय रहते उपचार मिल सके। दो से दस वर्ष की आयु के बीच बच्चों का प्रत्यारोपण करते हुए उन्हें रोग से मुक्ति दिलाई जा सकती है लेकिन इस आयु के बाद यह संभव नहीं हो पाता है और ऐसे कई मामले देखने को मिलते हैं जिन्हें देरी से जानकारी होने के कारण उनके बच्चों का समय खत्म हो जाता है।
अस्पताल की वरिष्ठ डॉ. सुपर्णो चक्रवर्ती ने बताया कि थैलेसीमिया एक अनुवांशिक रूप से होने वाली बीमारी है जिसके तहत व्यक्ति में रक्त की कोशिकाएं आम व्यक्ति से कम रहतीं हैं या उनमें विकृतियां हो सकती है। इसके रोगी को रक्त की आपूर्ति के लिए जीवनपर्यंत खून चढ़ाने पर निर्भर रहना पड़ सकता है। थैलेसीमिया समेत अन्य रक्त के विकारों की बात करें तो सिकल सेल एनीमिया जैसे रोग भी इसमें शामिल हैं। ऐसे रोगों के सदर्भ में बीएमटी को जटिल लेकिन सफल इलाज की श्रेणी में रखा जाता है। उन्होंने बताया कि बोन मैरो ट्रांसप्लांट यानी अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण ल्यूकीमिया, लिम्फोमा, अप्लास्टिक एनीमिया, स्किल एनीमिया, थैलेसीमिया में किया जाता है।
डॉ. सरिता जैसवाल ने बताया कि मरीज की प्रभावित बोन मैरो को स्वस्थ बोन मैरो से बदल दिया जाता है। इससे नई कोशिकाएं शरीर में मौजूद संक्रमण से लड़ने में मदद करती हैं। अभी तक इसके लिए 100 फीसदी एचएलए (ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन) का मिलान जरूरी था जो कि लाखों में से किसी एक का होता है। लेकिन अब 50 फीसदी एचएलए मिलान के साथ ही यह संभव है जिसे हैप्लो आइडेंटिकल यानी हाफ मैच बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन कहते हैं। उन्होंने बताया कि इसमें क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को डोनर की स्वस्थ स्टेम कोशिकाओं से प्रत्यारोपित करते हैं। इस प्रक्रिया में डोनर को किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होती है, न ही मरीज का कोई ऑपरेशन कराया जाता है।