नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने का आह्वान देशद्रोह नहीं है। विरोध प्रदर्शन एक लोकतांत्रिक समाज में किसी भी प्रकार से राजद्रोह नहीं हो सकता। सीएए के विरोध के दौरान आरोपी बनाए गए जेएनयू के छात्र शरजील इमाम ने अपनी जमानत पर उक्त तर्क रखा। उन्होंने कहा आलोचना मर गई तो समाज भी मर जाएगा।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत के समक्ष शरजील के अधिवक्ता तनवीर अहमद मीर ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल ने अपने भाषण में कहा था कि हमें लोगों को पत्थर नहीं मारने, हमें लोगों को चोट नहीं पंहुचानी, हम लोगों को केवल सड़क ब्लॉक करनी है ताकी सरकार जो नहीं मान रही वो मानने को तैयार हो जाए।
उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमणा की राजद्रोह कानून पर हालिया टिप्पणी का हवाला देते हुए कहा लोकतांत्रिक समाज में भाषण व विरोध राजद्रोह नहीं है। दिल्ली पुलिस ने हालही में इस मामले में आरोप पत्र दायर किया था जिसमें आरोप लगाया गया है कि इमाम शाहीन बाग नाकाबंदी का 'मास्टरमाइंड' था। यह भी आरोप लगाया है कि 15 दिसंबर 2019 की देर दोपहर इमाम ने जामिया के छात्र अरशद वारसी और उसके साथियों की मदद से शाहीन बाग स्थित रोड नंबर 13, कालिंदी कुंज रोड का स्थायी रूप से जाम कर दिया था।
शरजील के अधिवक्ता ने कहा कि उनका मुवक्किल न तो किसी प्रतिबंधित संगठन का सदस्य है और न ही किसी आतंकी संगठन का सदस्य है। वह मात्र एक छात्र है और उसने सरकार की नीति का विरोध किया है जो असंवैधानिक है।
मीर ने कहा हमें अपनी एकता पर गर्व है न कि बहुसंख्यकवाद पर। उन्होंने कहा यदि आलोचना का अधिकार खतम हो जाता है तो समाज खत्म हो जाता है। उन्होंने कहा हर व्यक्ति को संवैधानिक रूप से विरोध करने का अधिकार है। ऐसे में उनके मुवक्किल को जमानत प्रदान की जाए। इसी के साथ उन्होंने अपनी जिरह पूरी कर ली।
इस मामले में अब पुलिस के अधिवक्ता अपना पक्ष रखेंगे। अदालत ने मामले की सुनवाई एक सितंबर तय की है। इमाम ने 2019 में विश्वविद्यालय में दिए भाषणों से जुड़े मामले में जमानत की अर्जी दी है। उन भाषणों में उन्होंने असम तथा बाकी के पूर्वोत्तर क्षेत्र को देश से काटने की कथित तौर पर धमकी दी थी। उन्हें राजद्रोह तथा गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था।