हमारा यूक्रेन बॉर्डर तक पहुंचना नामुमकिन हो गया है। इसके अलावा हम हॉस्टल में भी सुरक्षित नहीं हैं। हमें सायरन बजते ही जान बचाने के लिए बंकर की तरफ भागना पड़ता है। दिन में दो-तीन बार ऐसा होता है। हमें बहुत ज्यादा डर लग रहा है। हम वतन वापसी के लिए हॉस्टल से 30-35 के ग्रुप में जाना चाहते हैं, लेकिन बॉर्डर तक जाने के लिए न तो बस मिल रही है और न ही ट्रेन। दो-तीन के ग्रुप में टैक्सी में जाने में डर लगता है।
यह कहना है सिमरन का। वह इस वक्त पुलतावा की अपनी यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में फंसी हैं। दिल्ली के नजफगढ़ की रहने वाली सिमरन सहगल ने अमर उजाला को सोमवार सुबह फोन पर बताया कि उन्होंने रविवार को हंगरी बॉर्डर तक जाने के लिए एक बस की व्यवस्था की थी।
बस उनके हॉस्टल में आ भी गई। जल्द ही भारत पहुंचने की उम्मीद में खुशी में उछलते हुए उनके ग्रुप के 30-35 विद्यार्थी बस में बैठे। इस बीच उसमें कुछ खराबी आ गई और बस नहीं चली। फिर, बस सही करने के लिए मैकेनिक नहीं मिले और वह खराब हालत में अभी तक उनके हॉस्टल में ही खड़ी है। इस तरह उनके हंगरी बॉर्डर तक पहुंचने के अरमानों पर पानी फिर गया। वह बहुत ही निराश एवं परेशान है।
उधर, कीव से करीब 500 किलोमीटर दूर एक मेडिकल यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे विभु के परिजनों ने बताया कि वह यूक्रेन के हालातों से जुड़ी पल-पल की खबरों पर नजर बनाए हुए है। वहां भारत के विद्यार्थियों को हो रही दिक्कत के बारे में मालूम होते ही अपने बेटे से बात करते हैं।