आरोपी चार जनवरी से न्यायिक हिरासत में है। उसने यह कहते हुए जमानत मांगी कि संबंध सहमति से थे और दोनों एक-दूसरे को आठ साल से जानते थे। आरोपी के वकील ने दलील दी कि शादी के झूठे वादे पर दुष्कर्म का मामला नहीं बनता और उसे नियमित जमानत दी जानी चाहिए। 17 फरवरी को पारित आदेश में अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष की पहली शिकायत नवंबर 2025 में दर्ज की गई थी, जिसे आरोपी और उसके परिवार की ओर से कथित विवाह के आश्वासन पर वापस ले लिया गया था। बाद में कुंडली न मिलने के आधार पर शादी से इनकार कर दिया गया।
जनवरी 2026 में वर्तमान प्राथमिकी भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (दुष्कर्म) और बीएनएस की धारा 69 के तहत दर्ज की गई। अदालत ने कहा कि घटनाक्रम से यह केवल ‘रिश्ता बिगड़ने’ का मामला नहीं प्रतीत होता, बल्कि आवेदक द्वारा विवाह के बार-बार आश्वासन देने का मामला है, जबकि उसे पता था कि उसका परिवार कुंडली मिलान पर जोर देता है।
अदालत ने कहा कि यह सही है कि केवल संबंध टूटने या विवाह न होने की स्थिति में आपराधिक कानून का सहारा नहीं लिया जा सकता। हालांकि, वर्तमान मामला इस चरण पर अलग स्थिति में है। अदालत ने कहा कि पहले दिए गए आश्वासनों के बावजूद कुंडली न मिलने के आधार पर बाद में शादी से इनकार करना प्रथम दृष्टया यह प्रश्न उठाता है कि आरोपी द्वारा दिया गया वादा किस प्रकृति और कितनी सच्चाई के साथ किया गया था। ऐसे में इस चरण पर यह आचरण बीएनएस की धारा 69 के तहत अपराध को आकर्षित करता है।