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निजी भूमि के नियोजित विकास के लिए बने नियमों को रद्द करने की मांग

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नई दिल्ली। उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और डीडीए को राजधानी में निजी स्वामित्व वाली भूमि के नियोजित विकास के लिए बनाए गए विनियमों के कुछ प्रावधानों को रद्द करने की मांग याचिका पर जवाब मांगा है। याचिका में विनियमों के उस प्रावधान को रद्द करने की मांग की गई है जिसके तहत गैर अधिग्रहित निजी स्वामित्व वाली भूमि पर मौजूदा संरचना के नियमितीकरण की मंजूरी नहीं दी जाती।
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मुख्य न्यायाधीश डी.एन. पटेल और न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की पीठ ने केंद्र सरकार और डीडीए के साथ पूर्वी दिल्ली नगर निगम से भी जवाब तलब करते हुए सुनवाई 12 अक्तूबर तय की है।
याचिकाकर्ता राजकुमार की ओर से पेश अधिवक्ता दीपांशु चोइथानी ने अदालत से निजी स्वामित्व वाली भूमि के नियोजित विकास के लिए डीडीए द्वारा 4 जुलाई, 2018 को जारी विनियम (अधिसूचना) के क्लॉज 3.3 को रद्द करने की मांग की है। याचिका में इस प्रावधान को मनमाना, भेदभावपूर्ण और संविधान के मौलिक अधिकारों के खिलाफ बताया है।
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याचिका में कहा गया है कि यह प्रावधान दिल्ली के समग्र विकास पर रोक लगाने की प्रकृति वाला है क्योंकि यह एकीकृत भवन उप-नियमों के अनुसार होने के बावजूद निजी स्वामित्व वाली गैर अधिग्रहित भूमि पर मौजूदा ढांचे को नियमित करने से इनकार करता है। याचिका में इस प्रावधान को दिल्ली विकास प्राधिकरण भवन उप-नियमों, मास्टर प्लान और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14,19, 21, 300ए के विपरीत बताया है।
याचिकाकर्ता ने कहा है कि यह प्रावधान उन भूमि के मालिकों के बीच भेदभाव करता है जिनकी भूमि पर कोई संरचना नहीं है और जिन्होंने अपनी भूमि पर कुछ निर्माण किया हुआ है। याचिकाकर्ता राज कुमार ने न्यायालय को बताया कि पूर्वी दिल्ली नगर ने उसकी संपत्ति को इस प्रावधान की वजह से नियमित करने से इनकार कर दिया।
याचिका में कहा गया है कि निगम न तो उनकी भूमि का अधिग्रहण कर रहा है और न ही याचिकाकर्ता की जमीन पर बनी संरचना को स्वीकृत या नियमित कर रहे हैं। याचिकाकर्ता ने पीठ को बताया कि उन्होंने पूर्वी दिल्ली नगर निगम के समक्ष अपनी जमीन को लेआउट योजना में शामिल करने और नियमितीकरण के लिए आवेदन किया था।
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आवेदन को इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि विनियमन का खंड 3.3 उस जमीन के नियमितीकरण पर लागू नहीं होता है जिस पर पहले से निर्माण हुआ है।
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