नई दिल्ली। खोरी गांव से हटाए गए सैकड़ों लोगों ने जनपथ मेट्रो स्टेशन के तीन नंबर गेट के सामने हाथ में रोटी लेकर मार्च निकाला। इस दौरान उन्होंने सरकार से पुनर्वास की मांग की। इसमें महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और दिव्यांग शामिल थे। लोगों ने कहा कि सरकार को अफगानिस्तान से आने वाले शरणार्थियों की चिंता है, लेकिन यहां लाखों लोगों के घर तोड़ दिए गए, अब वे सड़क पर ठोकर खा रहे हैं। पीएमओ का भी घेराव किया, फिर भी अब तक घर नहीं मिला है।
लोगों ने कहा कि उन्होंने महीने भर पहले पीएमओ का घेराव किया था, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया था। सरकार ने कहा था कि वह उन्हें रहने के लिए घर देगी, लेकिन अब तक पुनर्वास नहीं किया गया। दिल्ली सरकार पहले उन्हें बिजली, पानी और राशन देती थी, लेकिन संकट की घड़ी में मुंह मोड़ लिया है। दिल्ली विकास प्राधिकरण की जमीन पर बने मकानों को हरियाणा सरकार ने तोड़ दिया, डीडीए ने भी हरियाणा सरकार को ऐसा करने से नहीं रोका। महिलाओं ने गुहार लगाई कि सरकार या तो उन्हें घर दे या वहीं बसाए जहां वह पहले रह रहे थे।
परिसंघ के नेता संजय राज ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने 7 जून को खोरी गांव तोड़ने का निर्देश दिया था। तब अरावली की पहाड़ियों पर बसे गांव में 10,000 से ज्यादा परिवार रह रहे थे। लाखों लोग यहां अवैध रूप से दशकों से रह रहे थे। खोरी गांव के लोगों को दिल्ली सरकार द्वारा बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं दी जा रही थीं, बड़ी संख्या में लोगों के मतदाता पहचान पत्र व कई दूसरे कागजात भी बन गए थे, लेकिन कोर्ट के आदेश के बाद अचानक गांव पर बुलडोजर चला दिया गया।
प्रदर्शन कर रहे लोगों ने कहा कि अरावली की पहाड़ियों पर पांच सितारा होटल, राधा स्वामी सत्संग भी बने हैं। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। लेकिन पहले होटलों को न तोड़कर गरीबों के आशियाने तोड़े गए। मीनू वर्मा ने कहा कि खोरी गांव से निर्वासित लोगों की मांग है कि खोरी की जमीन बाहरी कंपनियों को बेचने के बजाय यहां रहने वाले लोगों को दी जाएं, उस पर रहने का अधिकार दिया जाए। अरावली की जमीन कब्जाने में शामिल भू माफिया, वन विभाग व नगर पालिका, बिजली विभाग के अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो और जुर्माना वसूला जाए। वहीं तोड़े गए घरों के लिए उचित मुआवजा दिया जाए।