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फैसले से पहले धाराओं में परिवर्तन का अधिकार : हाईकोर्ट

Mon, 13 Jan 2014 03:17 PM IST
अमर उजाला/ नई दिल्ली
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दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने ताजा आदेश में कहा है कि निचली अदालत को आपराधिक मामले में फैसला सुनाने से पहले अभियोग की धाराओं में संशोधित करने या नई धाराएं जोड़ने का विस्तृत अधिकार है।
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हाईकोर्ट खंडपीठ ने यह आदेश दहेज हत्या व दहेज प्रताड़ना से जुड़ी कई याचिकाओं का निपटारा करते हुए सुनाया है। आरोपियों ने निचली अदालत से मिली सजा को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

जस्टिस कैलाश गंभीर व जस्टिस इंदरमीत कौर ने अपने आदेश में कहा कि निचली अदालत को आरोपों को संशोधित करने अथवा नई धाराएं जोड़ने का असीमित अधिकार है, बशर्ते आरोपियों को अपना बचाव करने का पूरा मौका दिया जाए।
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खंडपीठ ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 216 का हवाला देते हुए कहा कि यह धारा निचली अदालत को आरोप तय करने या न तय करने में हुई गलती को सुधारने का पूरा अधिकार देती है।

अभियोजन के मुताबिक यश जैन ने अपने माता पिता वीणा जैन व सुभाष जैन और जीजा प्रशांत जैन के साथ मिलकर शादी के ढाई साल की अवधि में पत्नी शालू (28) की 23 जनवरी 1998 को हत्या कर दी थी। निचली अदालत ने यश जैन को उम्रकैद व अन्य आरोपियों को अलग-अलग अवधि की सजा सुनाई थी।

खंडपीठ ने निचली अदालत को कड़ी फटकार लगाते हुए आरोपियों के खिलाफ हत्या की धाराएं जोड़ने व मुकदमा चलाने का निर्देश दिया है। खंडपीठ ने धाराओं में उचित संशोधन न करने के लिए निचली अदालत को फटकार लगाई।

मामले को दोबारा सुनवाई के लिए भेजते हुए खंडपीठ ने कहा कि आरोपों में हत्या की धाराएं जोड़े जाने के लिए यह बिल्कुल सही केस है। इन धाराओं के तहत मुकदमे की सुनवाई के बाद ही हाईकोर्ट अभियोजन व बचाव पक्ष की दलीलों को सुनने और फैसला सुनाने की स्थिति में होगा कि यह मामला दुर्घटना में मौत या हत्या का है या नहीं।
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