अफगानिस्तान के काबुल पर तालिबान के कब्जे ने इंसाफ की नुमाइंदगी करने वाली मरियम की जिंदगी बदल दी। मोबाइल को देखती हुई जब नींद महसूस होती है तो बच्चों की सिसकियां सोने नहीं देती। वकालत के पेशे से जुड़ी मरियम 15 दिन पहले अपनी मां के इलाज के लिए फोर्टिस अस्पताल पहुंची थीं।
पांचों बच्चों के रोने की गूंजती आवाज सोने नहीं देती। उहापोह से जूझ रही महिला की दरख्वास्त है कि कोई उनके परिवार को यहां लाने में सहयोग करे। वहां लौटना खतरे से खाली नहीं। मरियम के साथ उनकी मां जंजीरा और भाई फरहान भी हैं।
फरहान ने बताया कि पढ़ाई के बाद मैं दिल्ली आया, लेकिन अब लौटने की राह में कई अड़चनें दिखने लगी हैं। रुपये धीरे-धीरे कम हो रहे हैं, वीजा खत्म होने तक अगर परिवार के सदस्य नहीं पहुंचे तो क्या करेंगे। बकौल मरियम, मैं वहां नहीं लौट सकती।
न तो महिलाओं को बाहर निकलने की इजाजत है और न ही पढ़ाई की। मैं वकालत तो कर रही थी, लेकिन मुवक्किल भी छुपते हुए पहुंचते थे। बैंक खाते में जमा रकम भी मिले न मिले, पता नहीं। अपने पति के भरोसे पांच बच्चों को छोड़कर आई हैं। पिछले तीन दिन से छोटे दो बच्चे लगातार रो रहे हैं।