नई दिल्ली। क्या दुनिया तुम्हारे पास आकर कहती है? कि देखो मैं हूं...। यह प्रश्न आपके किसी प्रियजन या इल्हाम के हो सकते हैं, जो आपको सामाजिक स्वार्थ के बारे में समझाने की चेष्टा करता है। अब जिंदगी में उलझनों के कई मतलब हो सकते हैं, लेकिन शांति का मतलब आत्मशांति से ही है। इसी तरह के कई सवालों से रविवार की शाम एलटीजी का ब्लैक कैनवास ऑडिटोरियम सराबोर रहा। कथाकार मंडली नाट्य समूह ने जब मानव कॉल की संवेदनशील कृति इल्हाम का मंचन किया तो दर्शकों ने खुदको कई सवालों के घेरे में पाया।
रुद्र प्रताप सिंह के निर्देशन और संगीत संयोजन में प्रस्तुत यह नाटक साधारण इंसान भगवान (राजीव मैनी) की असाधारण आध्यात्मिक यात्रा को सामने लाता है। एक सामान्य बैंक कर्मचारी अचानक दिव्य अनुभव का साक्षात्कार करता है। यह इल्हाम उसकी जिंदगी को भीतर तक हिला देता है। उसके सवाल बदल जाते हैं, उसका रास्ता बदल जाता है। मगर यही बदलाव उसकी पत्नी पूनम (धन्याजा नायर), बेटी पिंकी (संगहिता दास) और मित्र शुक्ला (स्वयं रुद्र प्रताप सिंह) को उलझन और पीड़ा में डाल देता है।
मानव कौल की लेखनी और निर्देशक रुद्र प्रताप सिंह का मंचन आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में यह संदेश देता है कि शायद जीवन का असली उद्देश्य सिर्फ जीना नहीं, बल्कि भीतर की सच्चाई को खोजना है।