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हिंदी हैं हम : विज्ञान के तकनीकी शब्दों का हिंदीकरण जरूरी, अनुपात का भी रहे ध्यान

Thu, 19 Aug 2021 05:38 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

  • विज्ञान वर्ग के प्रबुद्ध लोगों ने हिंदी विषय को लेकर अमर उजाला के साथ साझा किए विचार
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डॉ. मनोज कुमार पटैरिया और डॉ. दीपांकर साहा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिंदी समृद्ध भाषा के रूप में पहचान बना चुकी है। इस कड़ी में यह कला से लेकर विज्ञान वर्ग में अपनी छाप छोड़ रही है। लेकिन, आज भी विज्ञान के क्षेत्र में हिंदीकरण की कमी महसूस की जा रही है। इसे लेकर विज्ञान के क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले समाज के प्रबुद्ध लोगों ने हिंदी को लेकर अमर उजाला के साथ अपने विचारों को साझा किया।

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कई बार समानार्थी शब्द नहीं मिलते
विज्ञान की अपनी तकनीकी शब्दावली है। हिंदी में कई बार इसके शब्द मिल जाते हैं और कई बार इनके समानार्थी शब्द नहीं मिलते हैं। फिर, जिस तेजी से विज्ञान में हर दिन नए-नए शब्द गढ़े जा रहे हैं, उस अनुपात में उनका हिंदीकरण नहीं हो रहा है। भारत जैसे देश में, जहां हर प्रांत की अपनी भाषा है, वहां इस तरह की दिक्कत और भी ज्यादा है।

इसके लिए एक साथ अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय व स्थानीय स्तर पर काम करने की आवश्यकता है। जहां तक अपने देश में विज्ञान प्रसार की बात है, अभी तक हमने देश के 550 जिलों में तीन से पांच दिन की कार्यशाला का भी आयोजन किया है। इसमें स्थानीय लेखकों, मीडिया व विशेषज्ञों को जोड़ा गया है। इससे स्थानीयता आई है और आम लोगों में विज्ञान को लेकर समझ भी बढ़ी है।
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-डॉ. मनोज कुमार पटैरिया, सलाहकार, विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी विभाग, भारत सरकार

आत्मा से आत्मा को जोड़ती है हिंदी
हिंदी देश की मातृभाषा है। इस भाषा से कला, वाणिज्य एवं विज्ञान के क्षेत्र में काम किया जाता है। हालांकि, विज्ञान के क्षेत्र में हिंदी में अधिक सामाग्री न होने के कारण कुछ परेशानियां आती हैं लेकिन, यदि विज्ञान में हिंदी के शब्दों को बढ़ा दिया जाए तो अधिक परेशानी नहीं आएगी। हमारे पास बोलने के लिए कई भाषाएं हैं, लेकिन एक आत्मा को दूसरी आत्मा से जोड़ने के लिए हिंदी की भागीदारी अधिक है।

जो व्यक्ति विज्ञान को हिंदी भाषा में व्यक्त नहीं कर सकता, वह विज्ञान की अच्छी समझ नहीं रख पाता। आज हिंदी पर काम करने की आवश्यकता है। साथ ही हमें हिंदी में ही वार्तालाप करना चाहिए। इससे विज्ञान के क्षेत्र में हिंदी को अधिक महत्व मिलेगा। इसमें कोई दोराय नहीं है कि अपनी बात को भावनात्मक रूप से रखने के लिए हिंदी से बेहतर दूसरा कोई विकल्प नहीं है। यही वजह है कि विज्ञान के क्षेत्र में भी हिंदी को प्रमुख तौर पर पढ़ा व लिखा जाता है। 
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-डॉ. दीपांकर साहा, पूर्व निदेशक, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

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