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डिजिटल ऋण प्लेटफार्मों द्वारा अत्यधिक ऋण वसूली पर अदालत ने जताई चिंता

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नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने ऋण देकर सालाना पांच सौ फीसदी ब्याज एवं 30 फीसदी तक प्रोसेस फीस वसूल कर आम लोगों को कथित रूप से आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाले ऑनलाइन डिजिटल प्लेटफार्म पर शिकंजा कसने को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से तुरंत ठोस कदम उठाने को कहा है। अदालत ने आरबीआई के जवाब पर असंतुष्टि जताते हुए कहा कि आप अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
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मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल एवं न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की पीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह आरबीआई के साथ बैठकर ब्याज की दर तय करें और रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश करे। पीठ ने दोनों से कहा कि आप ऋण देने वाले ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के लिए ब्याज दर तय करें और देखते हैं कि वे लोग क्या करते हैं।
पीठ ने कहा कि वैसे ही हाईकोर्ट में कई गैर वाजिब जनहित याचिका दाखिल की जा रही हैं और उसे उस पर हर्जाना लगाकर उसे निरस्त किया जा रहा है, लेकिन यह आम लोगों से जुड़ी है और ठोस कदम उठाने जरूरी हैं। यह मुद्दा वाकई में जनहित से जुड़ा हुआ है।
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याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि आरबीआई के पास अधिकार हैं और वह इस तरह के कर्ज देने वाले एप पर शिकंजा कस सकता है। उन्होंने कहा कि इसको लेकर कमेटी गठित की गई थी जिसका अप्रैल महीने में ही समय समाप्त हो गया था। लेकिन उस कमेटी ने क्या रिपोर्ट दी उसके बारे में आरबीआई स्पष्ट नहीं कर रही है। आरबीआई के अधिवक्ता ने कहा कि आरबीआई बैंक और एनबीएफसी पर अपनी निगरानी रखती है, लेकिन कर्ज देने वाला एप पर उसका अधिकार नहीं है।
याची धरणीधर कनिमोझी ने याचिका में कहा है कि वर्तमान में इस तरह के लगभग तीन सौ प्लेटफार्म व एप हैं जो लोगों को पंद्रह सौ से लेकर 50 हजार रुपये तक का कर्ज देते हैं। यह कर्ज सात दिनों से लेकर 15 दिनों तक के लिए होता है। इस पर वे फॉर्म फीस, सर्विस चार्ज, प्रोसेसिंग फीस आदि के नाम पर 35 से 45 फीसदी तक कर्ज की राशि पहले ही ले लेते हैं। इसके अलावा भी इनके कई हिडेन चार्ज होते हैं।
याचिका में मांग की गई है कि कर्ज पर ब्याज का प्रतिशत निर्धारित किया जाना चाहिए। इसके अलावा कर्जदारों की परेशानियों की सुनवाई व समाधान के हर राज्य में एक कमेटी बनाई जानी चाहिए।
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