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Delhi News : हाईकोर्ट ने किया साफ- नाबालिग से दुष्कर्म के बाद शादी करने से अपराध की गंभीरता कम नहीं होती

Sat, 23 Jul 2022 04:11 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

हाईकोर्ट ने विवाह का दावा करने वाले आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए की टिप्पणी। 
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दिल्ली हाईकोर्ट - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दुष्कर्म के बाद नाबालिग से शादी करने व बच्चे के जन्म के आधार पर अपराध की गंभीरता कम नहीं हो जाती। ऐसे मामले में नाबालिग की सहमति का कोई मतलब भी नहीं रह जाता है क्योंकि कानून में उसका कोई महत्व नहीं है। अदालत ने उक्त टिप्पणी  आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते  हुए की।

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न्यायमूर्ति अनूप कुमार मेंदीरत्ता ने अपने फैसले में कहा कि बहला-फुसलाकर नाबालिग से संबंध बनाने के बाद उसकी सहमति के दावे को नियमित नहीं माना जा सकता। क्योंकि, दुष्कर्म केवल पीड़िता के खिलाफ ही नहीं बल्कि समाज के खिलाफ भी अपराध है। 

अदालत ने उक्त टिप्पणी करते हुए धारा 363, 366 व 376 के तहत दर्ज प्राथमिकी के अभियुक्त की जमानत याचिका खारिज करते हुए की। इस मामले में प्राथमिकी पीड़िता की मां ने दर्ज कराई थी। उसमें आरोप लगाया गया था कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने उसकी 15 साल की बेटी का अपहरण कर लिया है। लड़की जुलाई 2019 से लापता थी। मोबाइल की तकनीकी निगरानी करने पर वह  याचिकाकर्ता के घर से आठ महीने की बच्ची के साथ 5 अक्टूबर, 2021 को बरामद हुई थी। 
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यौन शोषण जघन्य अपराध 
अदालत ने कहा कि बच्चों का यौन शोषण जघन्य अपराध हैं। उसे प्रभावी ढंग से लागू करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि कानून नाबालिग के साथ यौन संबंध बनाने पर रोक लगाए हुए है। भले ही यौन संबंध सहमति से नाबालिग पत्नी के साथ ही क्यों न बनाया गया हो। सहमति से यौन संबंध बनाने व उससे बच्चे का जन्म हो जाने से यह अपराध को कम नहीं करता है। याचिकाकर्ता ने कहा है कि उसने पीड़िता के साथ एक मंदिर में विवाह किया गया था। यह अपराध को पवित्र नहीं कर सकता, क्योंकि पीड़िता नाबालिग थी और घटना के समय व 15 वर्ष से कम उम्र की थी। 
 

जेल में रिक्त पदों को भरने के मुद्दे पर जवाब के लिए दिया समय 

हाईकोर्ट ने राजधानी की जेलों में चिकित्सा व कल्याण अधिकारियों, परामर्शदाताओं और शिक्षकों के पदों सहित विभिन्न पदों पर स्वीकृत संख्या और लंबित रिक्तियों के संबंध में जानकारी देने के लिए दिल्ली सरकार को समय प्रदान किया है। मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की खंडपीठ ने सरकार को चार सप्ताह में स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश देते हुए सुनवाई 23 सितंबर तय की है।

पीठ अधिवक्ता अमित साहनी द्वारा दायर एक याचिका पर विचार कर रही है, जिसमें कहा गया है कि दिल्ली की जेलों में कई पदों के लिए बड़ी संख्या में रिक्तियां हैं। अधिवक्ता अमित साहनी ने कहा कि जेल कर्मचारियों, विशेष रूप से शैक्षिक और सुधारात्मक कर्मचारियों, मनोरोग सामाजिक कार्यकर्ताओं और मनोवैज्ञानिकों की कमी के बारे में चिंता पैदा करती है क्योंकि लंबी अवधि से पद रिक्त है।  
 
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कोर्ट के खिलाफ टिप्पणियां करने वाले वकील को अवमानना नोटिस 

हाईकोर्ट ने वरिष्ठ न्यायाधीश के खिलाफ ‘आरोप’ लगाने वाले वकील को अदालत की अवमानना का नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने कहा कि स्वस्थ लोकतंत्र के लिए निष्पक्ष न्यायपालिका होनी चाहिए, लेकिन यह प्रतिशोधी आलोचना से प्रभावित नहीं हो सकती।

जस्टिस जसमीत सिंह ने अधिवक्ता वीरेंद्र सिंह को नोटिस जारी करते हुए कहा, दुष्कर्म के मामले में निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील में किए गए कथन निंदनीय और अदालत की गरिमा और महिमा को कम करने के उद्देश्य से हैं। अदालत ने कहा, वकील ने न केवल एक जज, बल्कि कई न्यायाधीशों की प्रतिष्ठा और कामकाज पर हमला किया है। न्यायाधीशों का यह अपमान न्याय के प्रशासन को प्रभावित कर सकता है क्योंकि यह सार्वजनिक शरारत का एक रूप बन जाता है। एक न्यायाधीश पर एक अनुचित हमले को इस न्यायालय द्वारा नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। 

कोर्ट ने कहा कि एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए न्यायपालिका आलोचना से अछूती नहीं है, लेकिन जब आलोचना विकृत तथ्यों या भौतिक कथनों के सकल गलत बयानी पर आधारित है, तो जानबूझकर इस न्यायालय की गरिमा और सम्मान को कम करने के लिए, इसका संज्ञान लिया जाना चाहिए। रोहिणी अदालत द्वारा पारित फैसले के खिलाफ दायर अपील में यह आरोप लगाया गया था कि एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने इससे पहले, विभिन्न प्रकार की कार्यवाही में मामले से निपटने के दौरान व्यक्तिगत हित और आरोपियों के पक्ष में रवैया दिखाया था। हाईकोर्ट के जज ने संबंधित न्यायाधीश को मजबूर किया।

पिछले साल इसी मामले की सुनवाई के दौरान एक निचली अदालत के न्यायाधीश ने पीड़िता और उसके वकील द्वारा उसके खिलाफ आरोप लगाने के बाद मामले को किसी अन्य अदालत में स्थानांतरित करने का अनुरोध किया था। उत्तर जिले के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने यह कहते हुए मामले को उच्च न्यायालय के पास भेज दिया था कि केवल एक न्यायाधीश है जिसे विशेष न्यायाधीश, फास्ट ट्रैक, उत्तर के रूप में नामित किया गया है।
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