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छात्रों से वार्षिक और विकास शुल्क लेने के मामले में पक्ष रखने का निर्देश

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नई दिल्ली। उच्च न्यायालय ने सोमवार को दिल्ली सरकार और अन्य पक्षों को वार्षिक और विकास शुल्क लेने के मामले में लिखित जवाब पेश करने का निर्देश दिया है। दायर याचिका में सिंगल जज के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसमें निजी गैर सहायता प्राप्त स्कूलों को पिछले साल राजधानी में लॉकडाउन समाप्त होने के बाद की अवधि के लिए विद्यार्थियों से वार्षिक और विकास शुल्क लेने की अनुमति दी गई थी।
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मुख्य न्यायाधीश डी एन पटेल और न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की पीठ ने मामले में सुनवाई 14 जुलाई तय की है। दरअसल सभी पक्षों के अधिवक्ताओं ने मामले की अंतिम सुनवाई बुधवार करने का आग्रह किया था। पीठ ने सभी को सुनवाई की अगली तारीख से पहले अपना लिखित पक्ष दाखिल करने को कहा है।
उच्च न्यायालय ने गत सात जून को 450 गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों की एक्शन कमेटी को नोटिस जारी किया था। इसके अलावा एकल न्यायाधीश के 31 मई के आदेश के खिलाफ दिल्ली सरकार और छात्रों की अपीलों पर जवाब मांगा था। हालांकि, खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।
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अदालत ने एक्शन कमेटी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान और वकील कमल गुप्ता का बयान दर्ज करते हुए अगली सुनवाई तक छात्रों से फीस लेने के संबंध में वर्तमान सिद्धांतों का पालन करते रहने का भी निर्देश दिया था। एक्शन कमेटी ने भी आश्वासन दिया था कि वे अगले आदेश तक छात्रों को जबरन फीस जमा करने के लिए मजबूर नहीं करेंगे।
दिल्ली सरकार, छात्रों और ‘जस्टिस फॉर ऑल’ नामक एनजीओ ने दलील दी थी कि एकल न्यायाधीश का फैसला गलत तथ्यों पर आधारित है। एकल पीठ ने 31 मई के अपने आदेश में दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय द्वारा अप्रैल और अगस्त 2020 में जारी दो आदेशों को निरस्त कर दिया था, जिनके आधार पर वार्षिक शुल्क और विकास शुल्क लेने पर रोक थी।
अदालत ने कहा था कि आदेश मनमाने व गैरकानूनी हैं और दिल्ली स्कूल शिक्षा (डीएसई) अधिनियम एवं नियमों के तहत शिक्षा निदेशालय को दी गई शक्तियों से परे हैं। एकल न्यायाधीश ने 31 मई के अपने आदेश में कहा था कि दिल्ली सरकार के पास निजी गैर सहायता प्राप्त स्कूलों द्वारा लिए जाने वाले वार्षिक और विकास शुल्क को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि यह अनुचित रूप से उनके कामकाज को सीमित करेगा।
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