नई दिल्ली। उच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में व्यवस्था दी है कि यदि कोर्ट फीस का इस्तेमाल नहीं किया गया है तो सरकार उसे वापस करने के लिए बाध्य है और इसके लिए कोर्ट के आदेश की प्रति जमा कराने पर जोर नहीं दिया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता ने सात लाख 45 हजार रुपये रिफंड करने की मांग की थी क्योंकि उसकी कोर्ट फीस का प्रयोग मुकदमे में नहीं हुआ था।
न्यायमूर्ति नवीन चावला ने अपने फैसले में कहा कि कोर्ट फीस के भुगतान के लिए स्टांप स्वीकृत माध्यम है और यह प्रक्रिया तभी पूरी होती है जब दस्तावेज फाइल हो जाते हैं। महज स्टांप खरीद लेने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि भुगतान प्रक्रिया पूरी हो गई। फीस रिफंड के लिए कोर्ट के आदेश की प्रति जमा करने की पूर्व शर्त खत्म की जानी चाहिए। कोर्ट फीस का इस्तेमाल नहीं होने की बात से संतुष्ट होकर उसके रिफंड की प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए।
याचिकाकर्ता ने 31 अक्टूबर 2017 को स्टॉक होल्डिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एसएचसीआईएल) से कोर्ट फीस चुकायी थी। हालांकि, जब मुकदमा दायर नहीं हुआ, तो 22 फरवरी 2018 को रोहिणी सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट के समक्ष रिफंड के लिए अर्जी दी गयी थी।
याची की दलील थी कि वह रिफंड का हकदार है, क्योंकि मुकदमा दायर नहीं किया गया और ऐसी स्थिति में कोर्ट फीस का इस्तेमाल नहीं हुआ। कोर्ट ने 27 अगस्त 2019 को आदेश जारी करके याचिकाकर्ता को फीस रिफंड के लिए कोर्ट के आदेश की प्रति जमा कराने को कहा था। उसके बाद रिफंड वापस लेने के दिशा-निर्देश जारी करने की मांग को लेकर याचिका दायर की गयी थी।
न्यायमूर्ति नवीन चावला ने कहा कि स्टांप की आवश्यकता वाले किसी भी दस्तावेज को अदालत या कार्यालय की किसी भी कार्यवाही में तब तक दायर या उस पर कार्रवाई नहीं करनी चाहिए जब तक कि इसे रद्द नहीं किया जाता है। अदालत ने व्यवस्था दी कि उपरोक्त प्रावधान में यह स्पष्ट रूप से इंगित किया गया है कि दस्तावेज फाइल करने के वक्त कोर्ट फीस के भुगतान का माध्यम स्टांप ही है। इस तरह की फीस का भुगतान दस्तावेज फाइल करने के लिए किया जाता है, न कि केवल खरीद हेतु।