पड़ोसी राज्यों में लगातार पराली जलने की घटनाएं रिकॉर्ड हो रही हैं। यही नहीं पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष अक्तूबर से लेकर 11 नवंबर तक अधिक पराली जलने की घटनाएं रिकॉर्ड की गई हैं। पड़ोसी राज्यों से आने वाला पराली का जहरीला धुआं दिल्ली-एनसीआर की हवा को और दमघोंटू बना रहा है। इससे लोगों की सांसों पर संकट खड़ा हो गया है।
सफर के आंकड़ों के मुताबिक, 20 अक्तूबर से 11 नवंबर के बीच सबसे अधिक पराली जलने की घटनाएं रिकॉर्ड की गई हैं। बीते वर्ष जहां 30 अक्तूबर तक अधिकतम तीन हजार पराली जलने की घटनाएं रिकॉर्ड हुई थीं। इस वर्ष अक्तूबर में पराली जलने की घटनाएं चार हजार के करीब पहुंच गईं। एक से तीन नवंबर के बीच 3937 घटनाएं रिकॉर्ड हुई हैं।
पिछले वर्ष यह आंकड़ा तीन हजार के करीब रहा था। इस बार सबसे अधिक पराली जलने की घटनाएं दिवाली की रात के बाद से दर्ज हुई हैं। चार नवंबर की रात 5159 जगहों पर पराली जलाई गई। इसके बाद छह नवंबर को 5450 जगहों पर पराली जलने घटनाएं रिकॉर्ड हुई हैं। बीते वर्ष इन दिनों 3299 से लेकर 4189 जगहों पर पराली जलने की घटनाएं रिकॉर्ड हुई थीं।
वहीं, इस वर्ष नौ से 10 नवंबर तक 5317 जगहों पर पराली जली है, जबकि पिछले वर्ष इन दिनों दो हजार से 2500 जगहों पर पराली जलने की घटना रिकॉर्ड हुई थीं।
48 फीसदी रही पराली के धुएं की हिस्सेदारी
इस वर्ष पराली के धुएं की प्रदूषण में अधिकतम 48 फीसदी हिस्सेदारी रही है। पिछले वर्ष अधिकतम करीब 42 फीसदी तक पराली का धुआं प्रदूषण के लिए जिम्मेदार रहा था। बीते वर्ष 30 अक्तूबर से एक नवंबर के बीच सबसे अधिक पराली जलने की घटनाएं रिकॉर्ड की गई थीं। इस वर्ष पराली जलाने की घटनाओं में अधिक तेजी देखी गई है।
तीन नवंबर तक पराली जलने की हिस्सेदारी सिर्फ आठ फीसदी रही थी। इसके बाद चार से सात नवंबर के बीच इसकी हिस्सेदारी 25 से 36 फीसदी के आंकड़े को पार करते हुए 42 से 48 फीसदी तक दर्ज की गई। आठ नवंबर के बाद से पराली के धुएं की हिस्सेदारी 11 नवंबर तक घटकर 26 फीसदी रह गई।
राजधानी में सर्दी की शुरुआत में सिर्फ वाहनों से 50 से अधिक प्रदूषण होता है। इसके बाद घरेलू, उद्योग, धूल व अन्य चीजें प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं। ग्रीन थिंक टैंक सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की ओर जारी एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस वर्ष 24 अक्तूबर से आठ नवंबर तक सर्दियों के शुरुआती चरण में प्रदूषण में 50 फीसदी से अधिक वाहनों का योगदान है। इसके बाद घरेलू प्रदूषण (12.5-13.5 फीसदी), उद्योग (9.9-13.7 फीसदी), निर्माण (6.7-7.9 फीसदी), कचरा जलाने और सड़क की धूल ( 4.6-4.9 फीसदी और 3.6-4.1फीसदी) क्रमश: है।
यह रिपोर्ट पुणे में भारतीय उष्ण कटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) के वायु गुणवत्ता प्रबंधन के निर्णय समर्थन प्रणाली से स्रोत योगदान पर वास्तविक समय के आंकड़ों पर आधारित है। यह प्रणाली दिल्ली में संभावित उत्सर्जन स्रोतों के बारे में जानकारी प्रदान करती है। साथ ही दिल्ली के बाहर के 19 जिलों से स्रोतों के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों में पराली जलने के डाटा को भी इकत्रित करती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, दो से छह नवंबर के बीच सर्दी के प्रारंभिक चरण में एनसीआर में प्रदूषण स्रोतों का योगदान 70 से 80 फीसदी तक रहा। दीपावली के बाद स्मॉग में गिरावट आई, लेकिन दिल्ली का स्थानीय स्तर का प्रदूषण बढ़ा।
वहीं, अन्य राज्यों में भी पराली जलाने का योगदान दिवाली से पहले कम रहा, लेकिन दिवाली के बाद इसकी संख्या में बढ़ोतरी हुई। रिपोर्ट में कहा गया है कि लंबी दूरी की हवा पड़ोसी राज्यों में जलने वाले पराली के अधिक प्रदूषण को दिल्ली लेकर आई है। वहीं, दिल्ली में शाम 7:30 बजे से सुबह 9:30 बजे तक प्रदूषण के स्तर में भी इजाफा देखा गया है।
सीएसई की कार्यकारी निदेशक, रिसर्च एंड एडवोकेसी अनुमिता रॉय चौधरी ने कहा है कि दिल्ली में अपशिष्ट प्रबंधन पर कार्रवाई के साथ धूल नियंत्रण के तेज प्रयास होने चाहिए।