चिल्ला से एनएच-24 तक तीन किमी तक टेंट
यमुना की तराई से निकाले लोगों के लिए चिल्ला से एनएच-24 तक, डीएनडी से निजामुद्दीन फ्लाइओवर और यमुना बैंक से आईटीओ पुल तक राहत शिविर लगाए गए हैं। यहां खाने-पीने का इंतजाम है। सहायता समूहों की ओर से मेडिकल कैंप भी लगा दिए गए हैं। रात में निकाले लोगों को यहां सुबह करीब नौ बजे खाना दिया गया था और दोपहर में करीब डेढ़ बजे टेंट लगाने शुरू किए गए। नोएडा-दिल्ली लिंक रोड पर करीब 1000 राहत शिविर लगाए गए हैं। डूसिब की तरफ से यहां पर मोबाइल टॉयलेट लगाने की तैयारी की जा रही थी।
निकलने को तैयार नहीं थे लोग
लोग खड़ी फसल छोड़कर तराई इलाके से निकलने को तैयार नहीं थे। पूर्वी दिल्ली जिला प्रशासन की तरफ से जानकारी मिली कि सोमवार को रात 11 बजे से लोगों को तराई इलाके को खाली करने के लिए कह दिया गया था, लेकिन लोग झुग्गियों छोड़ने को तैयार नहीं थे। रात में करीब 30-40 फीसदी लोग बाहर आए। सुबह पानी बढ़ने लगा तो आधे लोग ऊपरी इलाके में पहुंचे। अभी भी 30 फीसदी लोग अंदर ही थे। इन्हें बाढ़ क्षेत्र से बाहर सुरक्षित बाहर निकालने के लिए एसडीएम और तहसीलदार को सिविल डिफेंस कर्मियों के साथ मैदान में उतरना पड़ा। देर शाम इन लोगों को बाहर निकालने में सफलता मिली।
सांप और बिच्छू का खतरा बढ़ा, एक बच्चे को डसा
मयूर विहार सब डिवीजन के तहसीलदार विनोद कुमार सिंह ने बताया कि रात में पानी बढ़ने पर ऊंची व सूखी जगहों पर पानी भरने लगा तो सांप व बिच्छू निकलने लगे। लोगों को उनके घरों के पास जाकर समझाने की कोशिश की गई कि अब तराई इलाके में रहना उनके लिए सुरक्षित नहीं है। बाढ़ का खतरा होने के साथ-साथ सांप-बिच्छू भी लोगों की जान के लिए खतरा बन सकते हैं। इस बीच पता चला कि मयूर विहार पुस्ते के नीचे एक बच्चे को सांप ने डस लिया है। उसे तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया। तत्काल इलाज के कारण उसकी जान बची। बच्चे की हालत अब ठीक है।
1978 की बाढ़ ने तोड़ दिया था रिकॉर्ड
1978 में दिल्ली में यमुना की बाढ़ ने कई रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। इसमें करीब 43 वर्ग किलोमीटर कृषि भूमि जलमग्न होकर बर्बाद हो गई थी। लाखों लोग बेघर हो गए थे। उस समय यमुना के लोहे के पुल पर जलस्तर 207.49 मीटर पहुंच गया था, तब यमुना के किनारों पर पुस्ते नहीं बनाए गए थे। इसके बाद दो बार और यमुना का जलस्तर 207 मीटर के निशान के पार गया है। 2010 (207.11 मीटर) और 2013 (207.32 मीटर) में दिल्ली को बाढ़ का सामना करना पड़ा था। कश्मीरी गेट तक यमुना का पानी पहुंच गया था।