दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के चुनाव में अध्यक्ष पद पर वामपंथी शिक्षक संगठन (डेमोक्रेटिक टीचर फ्रंट) ने पंच जड़ते हुए अपना ही रिकॉर्ड तोड़ा है। संगठन के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार ने लगातार पांचवीं बार जीत हासिल की है। शुक्रवार तड़के चार बजे घोषित नतीजों में डीटीएफ के उम्मीदवार राजीब रे 26वें डूटा चुनाव में 16वें अध्यक्ष चुने गए।
किरोड़ीमल कॉलेज में दर्शनशास्त्र शिक्षक राजीब रे ने भाजपा समर्थित नेशनल डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट (एनडीटीएफ) के डॉ एके भागी को 269 मतों से हराया। बीते चुनाव (2017) में भी डॉ. रे ने एनडीटीएफ के वीएस नेगी को 261 मतों से हराया था। इस बार चुनाव में कुल 9630 वोटर थे, जिसमें से 7749 ने ही मतदान किया। डॉ. रे को 3750 और डॉ भागी को 3481 मत मिले। राजीब रे 2008 से 2012 तक दो बार डीयू एक्जीक्यूटिव काउंसिल के सदस्य भी रह चुके हैं। वह वर्ष 2017 में पांचवें ऐसे डूटा अध्यक्ष बने थे जो डीयू में शिक्षक संबंधित सभी अहम पदों पर रह चुके हैं।
उनसे पहले ओपी कोहली, एसएस राठी, विजेन्द्र शर्मा और आदित्य नारायण मिश्रा ऐसा कर चुके हैं। डीयू शिक्षक संघ में राजीब रे से पहले डीटीएफ की डॉ. नंदिता नारायण 2013 और 2015 में अध्यक्ष बनी थीं। वर्ष 2011 में भी डीटीएफ के ही डॉ अमरदेव अध्यक्ष चुने गए थे।
डूटा चुनाव इस बार त्रिकोणीय हीं था। लेकिन अध्यक्ष पद पर दो ही उम्मीदवार मैदान में थे। राजीब रे को दक्षिणपंथी शिक्षक संगठन एनडीटीएफ से कड़ी टक्कर मिली। चुनावों से पहले कयास लगाए जा रहे थे कि इस बार एनडीटीएफ का पलड़ा भारी है। लेकिन इस भी डूटा में अध्यक्ष पद पर एनडीटीएफ का वनवास खत्म नहीं हुआ। बताया जा रहा है कि बीस साल पहले एनडीटीएफ का अध्यक्ष चुना गया था।
उल्लेखनीय है कि डूटा की 15 सदस्यीय कार्यकारिणी के नतीजे बृहस्पतिवार आधी रात के बाद घोषित कर दिए थे। इसमें एनडीटीएफ के चार उम्मीदवार विजयी रहे। वहीं इस चुनाव में हार जीत के अंतर से ज्यादा 518 अवैध वोट पड़े। अभी तक अवैध वोट पड़ने का रिकॉर्ड 535 वोट का है।
मौजूदा राष्ट्रीय शिक्षा नीति से शिक्षक खुश नहीं : रे
राजीब रे ने जीत के बाद कहा कि शिक्षकों ने एक बार फिर से डीटीएफ पर भरोसा जताया है, वह इसे कायम रखने का प्रयास करेंगे। उन्होंने कहा कि शिक्षक राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मौजूदा प्रारूप से खुश नहीं हैं। हमारा प्रयास रहेगा कि सरकार पर दबाव बनाकर नीति में शिक्षकों के हित में बदलाव कराए जाएं। शिक्षकों की पदोन्नति के लिए भी लड़ाई जारी रहेगी। तदर्थ शिक्षकों के समायोजन पर देखा जाएगा कि इस सपने को पूरा करने केे लिए क्या बेहतर किया जा सकता है।