उपराज्यपाल वीके सक्सेना दिल्ली में चंदन और बांस लगाने की नसीहत संबंधित सरकारी एजेंसियों को दे रहे हैं। उनका मकसद दिल्ली की आबोहवा साफ करने के साथ राजस्व के अतिरिक्त स्रोत का सृजन करना है, लेकिन पर्यावरणविद् इससे इत्तफाक नहीं रखते। विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली का पारिस्थितिक तंत्र चंदन और बांस के अनुकूल नहीं है। फायदा देने के बजाए यह दिल्ली को नुकसान पहुंचा सकते हैं। ज्यादा नम जगहों पर फलने-फूलने वाला चंदन दिल्ली के जल संकट को गहरा कर सकता है। वहीं, बांस का पथरीले रिज और यमुना नदी क्षेत्र में खड़ा होना ही मुश्किल है। दिल्ली की पारिस्थितिकी और दोनों वनस्पतियों के बीच संबंधों को तलाशती अमर उजाला संवाददाता किशन कुमार की रिपोर्ट....
दिल्ली में चंदन लगाना मुनाफे का सौदा नहीं : मनोज मिश्र
नीति आयोग ने सभी राज्यों से कहा है कि वह आयोग के मॉडल पर अपने वनों और कृषि भूमि पर चंदन और बांस के पेड़ लगाएं। इसके लिए किसानों को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। वहीं, करीब एक महीने पहले दिल्ली का उपराज्यपाल बनने के बाद से वीके सक्सेना का जोर भी चंदन और बांस लगाने पर है। दिल्ली सरकार समेत डीडीए, एमसीडी व एनडीएमसी के साथ की बैठकों में भी उपराज्यपाल ने इसकी सलाह दी है। लेकिन विशेषज्ञ दिल्ली के अपने पारिस्थितिकी तंत्र का हवाला देते हुए इस तरह के पौधे लगाने से बचने की बात कर रहे हैं।
यमुना जिये अभियान के संस्थापक मनोज मिश्रा कहते हैं कि दिल्ली में चंदन लगाना मुनाफे का सौदा साबित नहीं होगा। वजह यह कि चंदन के पौधों के लिए जिस प्रकार का पारिस्थितिकी तंत्र चाहिए, वैसा यहां मिलना मुश्किल है। दिल्ली की मिट्टी, तापमान, पानी समेत दूसरी परिस्थितियां चंदन के अनुकूल नहीं हैं। बावजूद इसके अगर यहां चंदन लगाया जाता है तो हमें सिर्फ लकड़ी ही मिलेगी, सही तरीके से पोषण नहीं मिल पाने से खुशबू नहीं रहेगी। ऐसे में आर्थिक तौर पर यह घाटे का सौदा साबित हो सकता है। जहां तक बांस का सवाल है तो इसकी देश भर में अलग-अलग प्रजातियां पाई जाती हैं।
बांस की जड़े उथली, टिकना मुश्किल
विशेषज्ञ बताते हैं कि बांस की जड़ें उथली होती हैं। ऐसे में अगर इसकी रोपाई सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में करते हैं तो मानसून के दौरान यह उखड़ जाएगा। इससे दूसरी समस्याएं भी पैदा होंगी। बांस अगर लगाना ही है तो किसी ऊंचे स्थान पर बांस लगाया जा सकता है। यहां किसी अन्य राज्यों में पाई जाने वाली बांस की प्रजाति की जगह स्थानीय प्रजाति जिसे लाठी बांस भी कहा जाता है, इसे लगाने पर जोर दिया जाना चाहिए। हालांकि, इनके लगाने की जगह किसी ऊंचाई वाला स्थान ही होना चाहिए, जिससे बाढ़ के पानी में कोई अवरोध नहीं हो।
अरावली रेंज के पेड़ लगने चाहिए
विशेषज्ञ कहते हैं कि दिल्ली में बाहरी वनस्पतियों की जगह अरावली रेंज में पाई जाने वाली वनस्पतियों को लगाया जा सकता है। इसमें करधई, बॉसवेलिया सेरेट, सेरेटा, बरगद, पीपल, कुल्लु, कैर, शीशम, कैम (जंगली कदंब), अर्जुन व जामुन शामिल हैं। वहीं, घास के मैदान पानी की सुरक्षित रखते हैं। पानी की वाष्प बनाने से रोकते हैं। घास में मूंज की दो प्रजाति हैं। इसमें स्पोनटेनियस सैकरम मूंजा व इंप्रेटा प्रजाति हैं। यह घास बाढ़ क्षेत्र में मिलती है। वहीं, यहां झाऊ प्रजाति की घास भी मिलती है। इससे यमुना के बाढ़ क्षेत्र को पुनर्स्थापित करने में मदद मिलेगी।
जरूरी महौल
- सालभर औसत से ज्यादा 600 मिमी तक बारिश
- वातावरण में अधिक नमी का न होना
- दोमट और लाल मिट्टी बेहतर। रेतीली मिट्टी में पैदावार संभव नहीं
- जल भराव वाले क्षेत्र अनुकूल नहीं
- उपज के लिए 15-35 डिग्री सेल्सियस का तापमान बेहतर
- जगह का समतल होना व मिट्टी का अधिक उपजाऊ होना
पारिस्थितिक तंत्र
- दिल्ली रिज और यमुना का एकदम विपरीत भौगोलिक तंत्र
- मौसम में उतार-चढ़ाव ज्यादा
- ठंड में 5 डिग्री सेल्सियस तक और गर्मी में यह आंकड़ा 45 के करीब
- कम समय में होती अधिक बारिश, लंबे समय तक रहता सूखा
- पोषक तत्वों की कमी, गुणवत्ता पर पड़ेगा असर
- सही पोषण न मिलने से खुशबू रहेगी कम
- इको सिस्टम के साथ आर्थिक तौर पर भी साबित हो सकता है घाटे का सौदा
सफेद चंदन का इस्तेमाल
- सफेद चंदन सदाबहार पेड़ है
- पेड़ से तेल और लकड़ी दोनों प्राप्त होते हैं
- लकड़ी और तेल का औषधियां बनाने में इस्तेमाल किया जाता है
- चंदन के अर्क को खान-पान में फ्लेवर के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है
- कॉस्मेटिक्स, पर्फ्यूम व साबुन में चंदन के तेल का इस्तेमाल किया जाता है