दिल्ली पुलिस दावा करती है कि उनकी पीसीआर वैन कॉल मिलने के बाद कहीं भी अधिकतम पांच मिनट में पहुंच जाती है। इसे लेकर लंदन, स्पेन और हांगकांग की पुलिस का हवाला देकर कहा जाता है कि दिल्ली पुलिस की पीसीआर वैन ने इन सभी शहरों के पुलिसिंग सिस्टम को पीछे छोड़ दिया है।
बता दें कि साल दर साल दिल्ली पुलिस कहती रही है कि हम अपनी पीसीआर वैन सर्विस में काफी सुधार कर रहे हैं। 2014 में करीब 25 हजार कॉल्स रोजाना मिलती थीं। इनमें 65 सौ कॉल्स ऐसी होती थीं, जहां पीसीआर मौके पर पहुंचती थी। बाकी कॉल्स ट्रैफिक जाम, परिवार की छोटी-मोटी कहासुनी, सड़क हादसा और संदिग्ध वस्तु आदि की होती थीं।
इस बाबत दिल्ली पुलिस की संचार एवं ऑपरेशन शाखा से जुड़े एक अधिकारी से बातचीत की गई है। उनका कहना है कि दिल्ली में दंगों के दौरान दर्जनभर इलाकों से ही हजारों कॉल्स आईं। जाफराबाद, मौजपुर, गोकुलपुरी, बाबरपुर, चांदबाग, बृजपुरी और दूसरे क्षेत्रों से सोमवार को करीब 34 सौ कॉल्स मिलीं।
इसके अगले दिन 76 सौ कॉल्स आईं। इसमें कई अन्य इलाके भी शामिल रहे। हालत यह रही कि एक मिनट में पांच-छह कॉल्स आ रही थीं। दिल्ली पुलिस के कंट्रोल रूम में 60 से ज्यादा कर्मी करीब 55 चैनल पर काम कर रहे थे। ज्यादातर कॉल ऐसी थी, जिसमें सही पते की जानकारी नहीं मिल रही थी।
हमारे पास जैसे ही कॉल आती, जानकारी पूछ कर संबंधित इलाके के पुलिस अफसरों को उसकी सूचना दे दी जाती। लोगों को 112 नंबर की ज्यादा जानकारी नहीं थी। हर कोई 100 नंबर पर ही फोन कर रहा था।
नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने बताया कि न तो हमारे पास किसी का सही एड्रेस था। सब लोग जोर-जोर से चिल्ला कर बोल रहे थे। एक इलाके में पीसीआर गई, लेकिन जब देखा कि स्थिति ज्यादा बिगड़ चुकी है तो हमने तय किया कि रास्ते में जो भी घायल दिखे, उसे अस्पताल पहुंचा दें।
यही दूसरी पीसीआर का हाल था। पहली कॉल का ही निपटारा नहीं हो पा रहा था और दूसरी ओर कॉल की लंबी कतार लगती गई। इससे सिस्टम बिगड़ता चला गया। मंगलवार तो हालत ऐसी थी कि बहुत कम कॉल्स तक पहुंचा जा सका।