करावल नगर मेन रोड पर काफी लंबे समय से पान का खोखा चला रहा हूं। 24 फरवरी 2020 को भी अपने खोखे के बाहर दिव्यांग पत्नी के साथ बैठा था। अचानक पत्नी और मुझ पर पत्थरों से हमला होने लगा। दंगाई हाथों में पत्थर उठाकर चिल्लाते हुए हमारी तरफ बढ़ रहे थे। 60 की उम्र में कभी ऐसा मंजर नहीं देखा था। पान का ठिया छोड़कर हमने पीछे वाली गली में भागकर जान बचाई, लेकिन दंगे में अपने रोजगार को नहीं बचा सका। यह कहते हुए सुरेश का गला रुंध जाता है।
उन्होंने बताया कि घर पहुंचने पर पत्नी भी बहुत घबरा गई थी। उनके दिमाग में दंगे की छाप कई दिनों तक बनी रही। मन में डर ऐसा था कि घरों में भी पानी को स्टॉक कर लिया था, जिससे दंगे की वजह से आग लगने पर बुझाया जा सके। कई दिनों तक कानों में दंगे का शोर होता रहा। हालत यह थी कि घर से बाहर जरूरी सामान लेने के लिए भी मन गवाही नहीं देता था। कई दिन तक घरों में कैद रहना पड़ा। बाहर की दुनिया से पूरी तरह से संपर्क खत्म हो चुका था। रिश्तेदार व पड़ोसियों से भी फोन पर बात होती थी। यदि हल्का सा भी शोर होता था तो बच्चों के आंसू निकल जाते थे। उन्होंने कहा कि लंबा समय गुजरने के बाद अब स्थिति पहले की तरह सामान्य हो गई है, लेकिन आज भी मन में कई बार वही तस्वीर जिंदा हो जाती है।
घर और कारोबार हो गए तबाह
26 फरवरी की दोपहर मैं अपने घर के बाहर खड़ा था। अचानक गली के प्रमुख रास्ते से दंगाइयों की भीड़ ने घर पर हमला कर दिया। वह मुझे पीटने लगे और जब तक बेहोश नहीं हो गया मारते रहे। अगले दिन जीटीबी अस्पताल में आंख खुली तो देखा कि मैं बिस्तर पर हूं और मेरे दाएं पैर की हड्डी टूट गई थी। कुछ दिन इलाज चला, लेकिन पूरी तरह ठीक नहीं हो पाया। दंगाइयों की ओर से दिए गए जख्म में आज भी ताजा हो जाते हैं। यह कहते ही उत्तर-पूर्वी दिल्ली के शिव विहार में रहने वाले मोहम्मद शान की आंखों में आंसू आ गए।
उन्होंने बताया कि उनके घर के नीचे ही पायजामे बनाने की दुकान थी। दंगों में घर और कारोबार दोनों तबाह हो गए थे। कारोबार ठप होने और पैर में समस्या होने के कारण हिम्मत टूट गई थी। घर पर रहने के दौरान हर समय वह खौफनाक मंजर आंखों के सामने आता रहता था। आलम यह था कि कई सप्ताह तक रात में नींद नहीं आई। तनाव चारों ओर से घेर चुका था। धीरे-धीरे वक्त के साथ हालात सुधरे, लेकिन अब भी उजड़ी हुई दुकान को नहीं बसा पाया।
मानसिक स्थिति हो गई खराब, छह महीने बाद गांव से लौटा
उत्तर-पूर्वी दिल्ली के शिव विहार तिराहे पर एल्युमीनियम सीट बनाने के एक कारखाने में हनीश काम करते हैं। अब वह कारखाना पहले जैसा नहीं रहा है। आधे हिस्से को मालिक ने किराए पर दे दिया है और काम करने वाले लोगों की संख्या भी आधी रह गई है। हनीश बताते हैं कि 24 फरवरी 2020 की दोपहर 2 बजे पड़ोस की एक इमारत से दंगाइयों ने कारखाने पर पेट्रोल बम फेंकने शुरू कर दिए। थोड़ी देर बाद ही उन्होंने देखा कि दंगाइयों की भीड़ हाथ में डंडे, रॉड और तेजाब की बोतल लेकर उनकी ओर बढ़ रही है।
यह देखते ही वह पिछली गली में भागे और गली के प्रमुख द्वार को बंद करके किसी तरह अपनी जान बचाई। दो दिन बाद जब वापस लौटे तो देखा कि पूरा कारखाना जल चुका था। अंदर का सारा सामान भी दंगाई लूटकर ले गए, जिस जगह वह 10 साल से काम करके अपने परिवार का पेट पाल रहे थे, उसकी ऐसी हालत देखकर उन्हें गहरा सदमा लगा। दंगे खत्म होने के बाद भी उन्हें ऐसा लगता था कि दंगाई कभी भी आकर उपद्रव फैला सकते हैं। मानसिक स्थिति ऐसी हो गई थी कि वह घटना बार-बार आंखों के सामने आती रही। यह देखकर घरवाले गांव लेकर चले गए और छह महीने तक दिल्ली नहीं लौटे।
इहबास अस्पताल में भी भर्ती हुए थे कई लोग
दंगों के दौरान 200 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इनमें से कुछ को उस घटना से मानसिक आघात पहुंचा था। ऐसे मरीजों का उपचार पूर्वी दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड अलाइड साइंसेज (इहबास) अस्पताल में चला। अस्पताल से मिली जानकारी के अनुसार, उस दौरान 40 से ज्यादा लोग मानसिक समस्याओं के चलते अस्पताल में भर्ती हुए थे। अस्पताल के एक डॉक्टर ने बताया कि कुछ मरीज ऐसे भी थे, जिनका पहले से ही यहां इलाज चल रहा था। दंगे की घटना को देखने के बाद उनकी हालात और खराब हो गई थी। कुछ दिन के इलाज के बाद उन्हें छुट्टी दे दी गई थी।