दो बेटों को 90 वर्षीय पिता का घर खाली करने के आदेश में हस्तक्षेप से इन्कार करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में अदालत का दखल देना वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के उद्देश्यों के खिलाफ होगा।
मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश के आदेश के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया। एकल पीठ ने संभागीय आयुक्त के उस आदेश को बरकरार रखा था, जिसमें दोनों बेटों को पिता का घर खाली करने का आदेश दिया गया था। क्योंकि, वृद्ध को बेटों से अपने शांतिपूर्ण अस्तित्व और जान को खतरा महसूस हो रहा था।
पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत एकल पीठ के निष्कर्षों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहती, क्योंकि अपीलकर्ता (बेटे) प्रतिवादी (पिता) की तुलना में संपत्ति पर बेहतर अधिकार साबित नहीं कर सकते। बेटों को परिसर से बेदखल करने के आदेश पर पीठ ने कहा कि एकल पीठ का निष्कर्ष वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के अनुरूप हैं, जो वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए लाया गया है।
अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता किसी भी तरह से प्रतिवादी के अधिकार से उच्च अधिकार दिखाने में सक्षम नहीं हैं, लिहाजा एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखते हुए अपील खारिज की जाती है। हालांकि, दोनों बेटों का कहना है कि संपत्ति के एक हिस्से पर उन्होंने पिता की सहमति से खर्च कर अपने लिए घर बनाया था, इसके अलावा पिता से समझौता भी हो गया था। हालांकि, पिता ने समझौते से इन्कार करते हुए कहा कि धोखे से हस्ताक्षर करवाए गए। वह इन दोनों को अपनी संपत्ति नहीं देना चाहता।
पिता ने कहा-दोनों बेटे करते हैं दुर्व्यवहार और मारपीट
वृद्ध पिता ने अदालत को बताया कि वह बलजीत नगर में घर का मालिक है। सबसे छोटा बेटा उसकी देखभाल करता है। चिकित्सा व अन्य जरूरतों को पूरी करता है। उसके अन्य दो बेटे उसके साथ दुर्व्यवहार और मारपीट करते हैं। लिहाजा, वह उन दोनों बेटों को अपनी संपत्ति से बेदखल करना चाहता है। वृद्ध की तरफ से पेश अधिवक्ता अरुण पंवार ने दलील दी कि दोनों बेटों की वजह से वृद्ध का अपने ही घर में शांति से रहना मुश्किल हो गया है।