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दिल्ली में यमुना का हाल : नदी में काला पानी, झाग की मोटी चादर और छठ व्रती

Wed, 10 Nov 2021 01:13 AM IST
दुष्यंत शर्मा  अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

कालिंदी कुंज पर समस्या ज्यादा। विशेषज्ञों की राय-फॉस्फेट से बन रहा यमुना में झाग। पानी कम होने से इसका घुलना संभव नहीं।
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किराड़ी में यमुना... इसी काले पानी में होगी पूजा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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काले रंग का पानी, पानी दूर-दूर फैली बर्फ सरीखी झाग की मोटी चादर और आस्था से सरोबार पानी में उतरते छठ व्रती... वजीराबाद से कालिंदी कुंज के बीच यमुना नदी के किनारों पर फिलवक्त यही नजारा है। नदी की दुर्दशा के बीच जान जोखिम में डालकर डुबकी लगाते व्रतियों के चेहरे पर इसका दर्द भी नजर आता है।  दरअसल, 1370 किमी लंबी यमुना नदी का करीब 54 किमी हिस्सा दिल्ली के पल्ला से कालिंदी के बीच से गुजरता है। 

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नेशनल ग्रीन ट्रिब्ल्यूनल (एनजीटी) की मॉनीटरिंग कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली के एक हिस्से वजीराबाद से कालिंदी कुंज के बीच यमुना की लंबाई 22 किमी है। यह पूरी नदी की लंबाई का सिर्फ दो फीसदी बैठता है, लेकिन यमुना का करीब 76 फीसदी प्रदूषण इसी हिस्से में होता है। मानसून के अलावा साल के नौ महीनों में नदी में ताजा पानी नहीं रहता। नदी दिल्ली के 22 नालों के शोधित व अशोधित सीवेज को लेकर आगे बढ़ती है। नदी की सालाना प्रकृति के विपरीत इस वक्त की झाग पर पर्यावरणविदों का कहना है कि समुद्र, नदी समेत दूसरे जल स्रोतों में अमूमन झाग वसा के अणु वाले पौधों के गलने से बनता है, लेकिन इस वक्त यमुना की झाग के मूल में फॉस्फेट है। 

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट (सीएसई) की पर्यावरणविद सुष्मिता सेनगुप्ता के मुताबिक, यमुना में फॉस्फेट का स्तर इस वक्त ज्यादा है। यह एक तो घरों में इस्तेमाल होने वाले साबुन से आता है। वहीं, फैक्ट्रियां भी इसकी मात्रा बढ़ा देती हैं। इससे यह भी साबित हो रहा है कि यमुना में बड़ी मात्रा में अशोधित सीवेज छोड़ा जा रहा है। 
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यह दिल्ली की शोधन की मौजूदा क्षमता 50 फीसदी से ज्यादा है। इस वक्त यह इसलिए भी दिख रहा है कि नदी में पानी कम होने से फास्फेट घुल नहीं पा रहा है। पर्यावरणविद फैयाज खुदसर का कहना है कि पेड़-पौधों की वसा से बनने वाली झाग नुकसानदेह नहीं होती, लेकिन फास्फोरस त्वचा को नुकसान पहुंचाता है। खुदसर के मुताबिक, फॉस्फेट पानी की बूंदों का सतही तनाव (सर्फेस टेंशन) कम कर देता है। इससे बड़ी मात्रा में झाग बनती है। यह पानी ऊंचाई से गिरता है तो झाग की मात्रा बढ़ जाती है। सर्दी के मौसम में तापमान कम होने और हवा दबाव बढने से झाग बनने की तीव्रता बढ़ जाती है। 

जानिए क्यों बनते हैं पानी में झाग

  • कार्बनकि अणुओं के सड़ने से झाग बनता है।
  • पेड़-पौधों के अलावा घरों व फैक्ट्रियों से निकलने वाले सीवेज से भी यह बनता है। 
  • इससे पानी का सतही तनाव कम हो जाता है।
  • बुलबुला पानी की सतह पर तैरता है।
  • कालिंदी कुंज में ज्यादा झाग इसलिए भी बन रहे हैं, क्योंकि इस हिस्से में नदी पूरी तरह प्रदूषित रहती है और पानी ओखला बैराज से ऊंचाई से छोड़ा जाता है। 

 

किराड़ी इलाके में बारिश के जमा पानी में छठ मनाएंगे पूर्वांचली

राजधानी में छठ पर्व मनाने के मामले में दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए) के दिशा निर्देशों और यमुना नदी में झाग बनने पर राजनीति गरमाई हुई है, वहीं पूर्वांचली बाहुल किराड़ी विधानसभा क्षेत्र में श्रद्धालु नेताओं के आरोप-प्रत्यारोप से दूरी बनाकर अपने इलाके में छठ पर्व मनाने की तैयारी में जुटे हुए है। खास बात यह है कि यहां सैंकड़ों एकड़ खाली भूमि में समस्या बना बारिश का जमा पानी छठ पर्व पर उन्हें राहत देने वाला साबित होगा।

पूर्वांचिलयों को छठ मनाने के लिए यहां न तो घाट बनाने और न ही घाटों के लिए पानी की व्यवस्था करने की जरूरत पड़ रही है। यहां सैंकड़ों एकड़ खाली भूमि में मानसून के दौरान पानी आज भी जमा है। उन्होंने इस भूमि के चारों ओर छठ मनाने की तैयारी आरंभ कर दी है। यहां वह साफ सफाई करने लग गए है और लाइट की भी व्यवस्था कर रहे है।

इस तरह इलाके की कालोनियों में रह रहे पूर्वांचलियों को अपने घरों के पास पानी जमा होने की समस्या के बीच छठ पूजा करने की सुविधा मिल गई है। इलाके के अधिकतर पूर्वांचली यमुना नदी के किनारे छठ पूजा करने के लिए जाते थे, लेकिन इस बार डीडीएमए की रोक के कारण नदी पर पूजा करना संभव नहीं है।

राजधानी में इस साल मानसून के दौरान हुई भारी बारिश के कारण ग्रामीण इलाके में बाढ़ जैसे हालात बन गए थे और अभी भी अधिक गांवों के खेतों और उनमें खाली भूमि पर बारिश का पानी जमा है। इन गांवों में किराड़ी विधानसभा क्षेत्र के किराड़ी समेत निठारी व मुबारिकपुर गांव भी शामिल है। इन गांवों में कालोनियों के बीच डीडीए की खाली पड़ी करीब 300 एकड़ भूमि पूरी तरह जलमग्न है। इस भूमि में घूटनों तक पानी जमा है। इलाके की कालोनियों में रह रहे पूर्वांचलियों ने इस पानी में खड़ा होकर छठ पर्व मनाने का निर्णय लिया है।

 
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विषैले पानी के दो घूंट से ही गंभीर बीमारियां

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि विषैले पानी की दो घूंट ही शरीर में गंभीर बीमारियां पैदा कर देती हैं। इससे त्वचा को नुकसान होता है। दूसरे नुकसानदेह रसायनों के मिलने से यह पानी जहरीला हो जाता है।

नई दिल्ली स्थित सफदरजंग अस्पताल के डॉ. विवेक कुमार का कहना है कि यमुना नदी के पानी में लोहा भी प्रचुर मात्रा में मौजूद है। पानी में भारी धातुओं की उच्च मात्रा कई स्वास्थ्य समस्याओं को पैदा कर सकती हैं। इससे वृद्धि, विकास, कैंसर, अंग क्षति, तंत्रिका तंत्र क्षति इत्यादि परेशानियां होती हैं।

साथ ही त्वचा रोग जैसे फंगस, काले धब्बे पड़ना, खुजली, लाल लाल त्वचा होने जैसी परेशानियां भी होने लगती हैं। वहीं, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉक्टरों का कहना है कि यमुना का पानी नहाने या पीने के लिए सुरक्षित नहीं है। इस पानी को सीधे तौर पर किसी भी तरह के उपयोग में नहीं लाया जा सकता।

लोकनायक अस्पताल के डॉ. अतुल बताते हैं कि दिल्ली में सालों से त्वचा रोगियों की संख्या बढ़ती आई है। यमुना के पानी का असर इस कदर है कि आसपास के इलाकों में त्वचा खासतौर पर फंगस के रोगी सबसे ज्यादा हैं।
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