राजधानी में छठ पर्व मनाने के मामले में दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए) के दिशा निर्देशों और यमुना नदी में झाग बनने पर राजनीति गरमाई हुई है, वहीं पूर्वांचली बाहुल किराड़ी विधानसभा क्षेत्र में श्रद्धालु नेताओं के आरोप-प्रत्यारोप से दूरी बनाकर अपने इलाके में छठ पर्व मनाने की तैयारी में जुटे हुए है। खास बात यह है कि यहां सैंकड़ों एकड़ खाली भूमि में समस्या बना बारिश का जमा पानी छठ पर्व पर उन्हें राहत देने वाला साबित होगा।
पूर्वांचिलयों को छठ मनाने के लिए यहां न तो घाट बनाने और न ही घाटों के लिए पानी की व्यवस्था करने की जरूरत पड़ रही है। यहां सैंकड़ों एकड़ खाली भूमि में मानसून के दौरान पानी आज भी जमा है। उन्होंने इस भूमि के चारों ओर छठ मनाने की तैयारी आरंभ कर दी है। यहां वह साफ सफाई करने लग गए है और लाइट की भी व्यवस्था कर रहे है।
इस तरह इलाके की कालोनियों में रह रहे पूर्वांचलियों को अपने घरों के पास पानी जमा होने की समस्या के बीच छठ पूजा करने की सुविधा मिल गई है। इलाके के अधिकतर पूर्वांचली यमुना नदी के किनारे छठ पूजा करने के लिए जाते थे, लेकिन इस बार डीडीएमए की रोक के कारण नदी पर पूजा करना संभव नहीं है।
राजधानी में इस साल मानसून के दौरान हुई भारी बारिश के कारण ग्रामीण इलाके में बाढ़ जैसे हालात बन गए थे और अभी भी अधिक गांवों के खेतों और उनमें खाली भूमि पर बारिश का पानी जमा है। इन गांवों में किराड़ी विधानसभा क्षेत्र के किराड़ी समेत निठारी व मुबारिकपुर गांव भी शामिल है। इन गांवों में कालोनियों के बीच डीडीए की खाली पड़ी करीब 300 एकड़ भूमि पूरी तरह जलमग्न है। इस भूमि में घूटनों तक पानी जमा है। इलाके की कालोनियों में रह रहे पूर्वांचलियों ने इस पानी में खड़ा होकर छठ पर्व मनाने का निर्णय लिया है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि विषैले पानी की दो घूंट ही शरीर में गंभीर बीमारियां पैदा कर देती हैं। इससे त्वचा को नुकसान होता है। दूसरे नुकसानदेह रसायनों के मिलने से यह पानी जहरीला हो जाता है।
नई दिल्ली स्थित सफदरजंग अस्पताल के डॉ. विवेक कुमार का कहना है कि यमुना नदी के पानी में लोहा भी प्रचुर मात्रा में मौजूद है। पानी में भारी धातुओं की उच्च मात्रा कई स्वास्थ्य समस्याओं को पैदा कर सकती हैं। इससे वृद्धि, विकास, कैंसर, अंग क्षति, तंत्रिका तंत्र क्षति इत्यादि परेशानियां होती हैं।
साथ ही त्वचा रोग जैसे फंगस, काले धब्बे पड़ना, खुजली, लाल लाल त्वचा होने जैसी परेशानियां भी होने लगती हैं। वहीं, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉक्टरों का कहना है कि यमुना का पानी नहाने या पीने के लिए सुरक्षित नहीं है। इस पानी को सीधे तौर पर किसी भी तरह के उपयोग में नहीं लाया जा सकता।
लोकनायक अस्पताल के डॉ. अतुल बताते हैं कि दिल्ली में सालों से त्वचा रोगियों की संख्या बढ़ती आई है। यमुना के पानी का असर इस कदर है कि आसपास के इलाकों में त्वचा खासतौर पर फंगस के रोगी सबसे ज्यादा हैं।