कोर्ट ने कहा है कि दृश्य को महत्वहीन न बनाएं, जिससे यह प्रतीत हो कि कोई भी किसी भी क्लीनिक में जा सकता है और इसे करवा सकता है। फिल्म इस तरह से हो कि लोग जागरूक हो सकें।
फिल्म निर्माताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जयंत मेहता ने कहा कि फिल्म कुछ अवैध कार्यों को लेकर है और इसमें अधिनियम की अवैधता से संबंधित एक डिस्क्लेमर भी है। वहीं, केंद्र सरकार के वकील अनुराग अहलूवालिया ने कहा कि ट्रेलर को सीबीएफसी द्वारा प्रमाणित किया गया था और फिल्म निर्माताओं को एक डिस्क्लेमर लगाने के लिए कहा गया था।
अदालत ने कहा कि ट्रेलर में डिस्क्लेमर अपने आकार के कारण ध्यान देने योग्य नहीं था और यह उन परिस्थितियों को नहीं दिखाता है, जिनमें महिला को क्लीनिक ले जाया जाता है।
याचिकाकर्ता यूथ अगेंस्ट क्राइम की ओर से पेश वकील पवन प्रकाश पाठक ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि फिल्म लिंग निर्धारण के साधन के रूप में अल्ट्रासाउंड तकनीक को बढ़ावा नहीं दे सकती, क्योंकि यह कानून के तहत अवैध है। इसे लेकर अदालत का कहना है कि एक दृश्य को उसके संदर्भ में देखा जाना चाहिए। अदालत ने सवाल किया कि क्या फिल्म समाज की बुराई दिखा रही है या लिंग निर्धारण की तकनीकों को अपनाने की वकालत कर रही है।
याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में कहा है कि ट्रेलर में भ्रूण के लिंग का पता लगाने के लिए क्लीनिक में अल्ट्रासाउंड तकनीक का इस्तेमाल और लड़की के मामले में गर्भपात तकनीक का दृश्य कानून के खिलाफ है, जो कि अल्ट्रासाउंड तकनीक के बढ़ावे को प्रतिबंधित करता है।
याचिकाकर्ता ने कहा है कि गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994 (पीसी और पीएनडीटी अधिनियम) की धारा 3, 3ए, 3बी, 4, 6 और 22 लिंग निर्धारण के लिए अल्ट्रासाउंड तकनीक के बढ़ावे को पूरी तरह से प्रतिबंधित करती है और अधिनियम के उद्देश्य को भी नकारती है। याचिका में कहा गया है कि याचिकाकर्ता कन्या भ्रूण हत्या के मुद्दे और जनता में जागरूकता पैदा करने के मुद्दे की सराहना करता है, लेकिन समस्या यह है कि अल्ट्रासाउंड दृश्य को बिना सेंसर के खुलेआम दिखाया जा रहा है।