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दिल्ली हाईकोर्ट : कहा- अभियोग तय करने से पहले साक्ष्यों का गंभीरता से विश्लेषण जरूरी

Sun, 05 Sep 2021 05:43 AM IST
दुष्यंत शर्मा विजय सिंघल, नई दिल्ली

सार

  • कहा, न्यायिक विवेक के उपयोग की अनुपस्थिति गंभीर अन्याय का कारण बन सकती है
  • कोर्ट पोस्ट ऑफिस नहीं है कि अभियोजन पक्ष के आदेश पर अभियोग तय करें
  • सामूहिक दुष्कर्म व अप्राकृतिक कृत्य के मामले में पति-पत्नी के खिलाफ तय अभियोग खारिज
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दिल्ली हाईकोर्ट - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में अभियोग तय करने से पहले पेश साक्ष्यों का गंभीरता से विश्लेषण करना चाहिए कि मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य हैं या नहीं। कोर्ट मात्र पोस्ट ऑफिस नहीं है कि अभियोजन पक्ष के आदेश पर अभियोग तय करे दे। उसे अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग कर यह निर्धारित करना होता है कि मुकदमा चलाया जा सकता है या नहीं। हाईकोर्ट ने सामूहिक दुष्कर्म व अप्राकृतिक कृत्य के मामले में पति-पत्नी के खिलाफ निचली अदालत द्वारा तय अभियोग आदेश को खारिज करते हुए ये टिप्पणी की।

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न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट को देखना है कि आरोपी के खिलाफ कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार है या नहीं। उन्होंने कहा इस मामले में स्पष्ट है कि पीड़ित महिला की भूमिका संदिग्ध है और उसने जिन दो फ्लैटों में याची दीपक दुआ व उसके पार्टनर कृष्ण कुमार द्वारा दुष्कर्म का आरोप लगाया है वह दोनों फ्लैट महिला के नाम पर किराए पर हैं। 

अदालत ने कहा कि महिला ने पुलिस आयुक्त व गौतम बुद्ध नगर अदालत में दी शिकायत में कृष्ण कुमार से फ्लैट के विवाद की शिकायत दी है और कहीं भी दुष्कर्म व अन्य आरोप नहीं लगाए। यह मामला घटना से करीब ढाई वर्ष बाद दर्ज करवाया गया और उसमें याची की पत्नी का नाम भी दर्ज करवा दिया।
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अदालत ने याची के अधिवक्ता के उस तर्क को स्वीकार कर लिया कि महिला ने कृष्ण कुमार से अपने विवाद को निपटाने के लिए उनके मुवक्किल व उनकी पत्नी को फर्जी मामले में फंसाया है।

अदालत ने निचली अदालत द्वारा याची के खिलाफ सामूहिक दुष्कर्म, अप्राकृतिक कृत्य, जान से मारने की धमकियां इत्यादि देने के आरोप में तय अभियोग संबंधी फैसले को खारिज करते हुए कहा कि न्यायिक विवेक के उपयोग की अनुपस्थिति गंभीर अन्याय का कारण बन सकती है जो किसी व्यक्ति को अपनी गलती के बिना कानूनी प्रणाली की कठोरता से प्रेरित कर सकती है। 

उन्होंने कहा निचली अदालत के 14 सितंबर 18 के आदेश के अवलोकन से संकेत मिलता है कि कोर्ट मामले के तथ्यों पर अपना दिमाग लगाने में विफल रहा है। ट्रायल कोर्ट को यह तय करने के लिए आरोपपत्र का अधिक बारीकी से विश्लेषण करना चाहिए था कि क्या आरोपों और उसके बाद की गई जांच के आलोक में याचिकाकर्ता के खिलाफ अपराध बनाया गया है।

क्या था मामला
महिला ने मामला दर्ज करवाया कि वह अपने पति से विवाद के चलते अलग रह रही थी और वजन कम करने के लिए 8 फरवरी 12 को कृष्ण कुमार के जिम में गई। पति से अलग होने का फायदा उठाकर कृष्ण उसके नजदीक आ गया। नवंबर 13 में कृष्ण ने कहा कि उसका वजन कम नहीं हो रहा और वह उसे प्रयत्न विहार के जिम में ले जाएगा। वहां आधुनिक मशीनें लगी हैं। 

वह उसके साथ गई तो वहां आरोपी दीपक दुआ भी था। दोनों ने उसके साथ चाकू की नोक पर दुष्कर्म किया व उसकी अश्लील फोटो व वीडियो बना लिया। इसके बाद लगातार यह क्रम चलता रहा और कृष्ण ने कहा कि वह उसके साथ विवाह कर लेगा।

पीड़िता ने कहा कि आरोपी उसे नोएडा के एक फ्लैट में ले गए। वहां आरोपी दीपक की पत्नी भी थी। दोनों ने कई बार ब्लैकमेल कर दुष्कर्म किया व जान से मारने की धमकी दी। यह सिलसिला 8 अप्रैल 2016 तक चलता रहा।
 

आईडी लेता तो लड़की को दुष्कर्म से बचाया जा सकता था-हाईकोर्ट

उच्च न्यायालय ने एक होटल के मालिक अजय कुमार को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया है। होटल में 16 वर्षीय नाबालिग लड़की से चार दिनों तक दुष्कर्म किया गया था। अदालत ने कहा आरोपी ने बिना वैध लाइसेंस के होटल चलाकर अपराध में मदद की और न होटल में आने वाले आरोपी व पीड़िता का पहचान पत्र रखा।

न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर ने अपने फैसले में कहा कि यदि निजामुद्दीन स्थित होटल में बुकिंग के समय पीड़िता और आरोपी की आईडी ली जाती तो नाबालिग लड़की को दुष्कर्म से बचाया जा सकता था। उन्होंने कहा इस तरह से होटल चलाकर और होटल में ठहरने वाले मेहमानों का रिकॉर्ड रखे बिना याचिकाकर्ता अपराध में मदद कर रहा है और इस मामले में नाबालिगा ऐसी ही एक पीड़ित है।

मामले में पीड़िता के पिता की शिकायत पर अपहरण, दुष्कर्म पोक्सो एक्ट इत्यादि धाराओं में मामला दर्ज किया गया था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि नाबालिग पीड़िता का आरोपी जितेंद्र पाल ने अपहरण कर लिया था। वह उसे निजामुद्दीन इलाके के एक होटल में ले गया, जहां उसके साथ चार दिन तक दुष्कर्म किया गया।

याचिकाकर्ता ने तर्क रखा कि होटल के मालिक होने के नाते, होटल के कर्मचारियों द्वारा की गई बुकिंग में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। अदालत ने आरोपी के तर्क को खारिज करते हुए कहा मौजूदा मामले में पीड़िता की आयु करीब 16 साल की है और होटल में उसके साथ 4 दिनों तक दुष्कर्म किया गया। पेश साक्ष्यों से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता होटल का मालिक उसी परसिर में रहता है, और वह यह नहीं कह सकता कि उसे इस बात की जानकारी नहीं थी कि उसके होटल में क्या हो रहा है। वह पूरा दोष होटल के कर्मचारियों पर नहीं डाल सकता।

अदालत ने कहा याचिकाकर्ता आरोपी द्वारा बिना किसी वैध लाइसेंस के होटल चलाया जा रहा था और मेहमानों का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जा रहा था न कोई आईडी नहीं ली जा रही थी। पीड़िता और आरोपी जितेंद्र पाल की आईडी उस समय ली जाती थी। अगर उक्त बुकिंग होती तो नाबालिग लड़की को दुष्कर्म से बचा लिया जाता।

अदालत ने कहा पीड़िता की गवाही अभी दर्ज नहीं की गई, आरोपों और अपराध की गंभीरता और याचिकाकर्ता द्वारा निभाई गई भूमिका को देखते हुए जमानत का कोई आधार नहीं है।

स्पा सेंटर चलाने की आरोपी महिला के पति की जमानत याचिका खारिज

हाईकोर्ट ने स्पा के नाम पर युवतियों को देह व्यापार में झोंकने के मामले को गंभीरता से लिया है। अदालत ने स्पा सेंटर चलाने वाली महिला के पति को जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा ऐसा नहीं माना जा सकता कि आरोपी को नहीं पता हो कि उसकी पत्नी स्पा में क्या गतिविधियां चला रही है। अदालत ने कहा आरोपी पर लगे आरोप में 20 वर्ष या आजीवन कारावास तक का प्रावधान है।

न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने अपने फैसले में आरोपी कुलदीप के जमानत आवेदन को खारिज करते हुए कहा कि इस अपराध के साबित होने पर याचिकाकर्ता को कारावास की सजा दी जाएगी जो 20 साल से कम नहीं होगी लेकिन ये आजीवन कारावास तक हो सकती है। यह सजा उस व्यक्ति के प्राकृतिक जीवन के शेष या मृत्यु तक होगी।

अदालत ने कहा पीड़िता की आयु और इस तथ्य को देखते हुए कि याचिकाकर्ता साधन संपन्न है। ऐसे में गवाहों को प्रभावित करने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। याचिकाकर्ता द्वारा सबूतों के साथ छेड़छाड़ की संभावना है और सजा की गंभीरता को देखते हुए उसके फरार होने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।

अदालत ने कहा कि पेश साक्ष्यों व सीसीटीवी फुटेज से स्पष्ट है कि आरोपी नियमित रूप से पत्नी पूनम के स्पा में आता-जाता था। इसके अलावा लगातार पत्नी से फोन पर संपर्क में रहा है। अदालत ने कहा कि मामले में अभी अभियोग तय नहीं हुए और वर्तमान में आरोपी को जमानत देना उचित नहीं है।

अमन विहार थाने में यह मामला 25 अक्तूबर 20 को 17 वर्षीय पीड़िता के बयान पर दर्ज किया गया था। पीड़िता ने आरोप लगाया कि माता-पिता की मौत के बाद वे बहन-भाई चाचा चाची के पास रहते थे। उसकी चाची एक स्पा में काम करती थी और उसने कहा कि घर में बैठने के बजाय वह भी उसके साथ काम करे। चाची उसे आरोपी पूनम के पास ले गई और उसने देखा कि स्पा सेंटर में केबिन बने हुए हैं और उनमें बेड भी लगे हैं।

पीड़िता ने कहा कि पूनम ने उसे एक केबिन में जाने के लिए कहा कि ग्राहक अंदर इंतजार कर रहे हैं। उसने केबिन में जाने से मना कर दिया तो पूनम के कहने पर चाची ने उसकी पिटाई कर दी। इसके बाद उसे जबरन स्पा में ग्राहकों के पास भेजा जाने लगा। इसके बाद उसे कई होटलों में भेजा गया व उसका शारीरिक शोषण किया गया। 

पीड़िता ने कहा कि 21 अक्तूबर 20 को मौका पाकर वहां से भाग गई। उसने बहन और भाई को घटना की जानकारी दी। इसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी कुलदीप सहित अन्य को गिरफ्तार कर लिया था।
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छेनू गैंग के सरगना को हत्या व हत्या के प्रयास के मामले में जमानत नहीं

हाईकोर्ट ने जेल में बंद होने के बावजूद आपराधिक वारदातों में लिप्त आरोपी के रवैये को गंभीरता से लिया है। अदालत ने माना कि किसी भी आपराधिक मामले में षड्यंत्र रचने वाले आरोपी का घटनास्थल पर होना जरूरी नहीं होता। ऐसे अपराधी के कारण ही गवाह कोर्ट में गवाही से कतराते हैं। हाईकोर्ट ने कुख्यात छेनू गैंग के सरगना इरफान को हत्या व हत्या के प्रयास के मामले में जमानत याचिका खारिज करते हुए उक्त टिप्पणी की।

न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर ने अपने फैसले में कहा कि इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि आरोपी इरफान पर 25 गंभीर प्रकृति के मामले दर्ज हैं। इनमें से 14 मामले अदालत में विचाराधीन है। अदालत ने अभियोजन पक्ष के उस तर्क को स्वीकार कर लिया कि आरोपी के डर से गवाह कोर्ट में अपनी गवाही से मुकर रहे हैं। यदि आरोपी को जमानत दी गई तो अन्य गवाह भी अदालत में गवाही के लिए नहीं आएंगे।

अदालत ने बचाव पक्ष के उस तर्क को खारिज कर दिया कि हत्या व हत्या के प्रयास के इस मामले में उनका मुवक्किल इरफान घटनास्थल पर नहीं था और वह उस समय जेल में बंद था। ऐसे में उसे मात्र इस कारण फर्जी मामले में फंसा दिया कि क्योंकि उसके खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। अदालत ने कहा कि किसी भी आपराधिक घटना के समय षड्यंत्रकारी की मौके पर उपस्थिति जरूरी नहीं होती। षड्यंत्र कहीं भी रचा जा सकता है। 

अदालत ने कहा आरोपी के उस तर्क को भी खारिज कर दिया कि इस मामले में चार आरोपी जमानत पर हैं और समानता के आधार पर उसे भी जमानत दी जाए। अदालत ने कहा अपराध की गंभीरता को देखते हुए आरोपी समानता के आधार पर जमानत का हकदार नहीं है। निष्पक्ष ट्रायल, गवाहों की सुरक्षा को देखते हुए उसे जमानत देना उचित नहीं होगा। अदालत ने कहा पुलिस के अनुसार आरोपी इरफान गिरोह का सरगना है और जेल में अपने साथियों के जरिये अपराध को अंजाम दे रहा है।

अभियोजन पक्ष के अनुसार 22 अक्तूबर 17 को वाजिद व फैज स्कूटी पर ब्रहमपुरी रोड पर जा रहे थे। उसी दौरान दो मोटर साइकिलों पर आरोपी राशिद, इमराम उर्फ बड़ा इमरान, मुमताज, नासिर, रिजवान व राशिद अली आए और फैज पर गोली चला दी। वाजिद स्कूटी गिरने पर भागा व आरोपियों ने उसका पीछा कर आटोमैटिक हथियार से गोलियां चलाईं जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई।

अभियोजन पक्ष के अनुसार जांच में सामने आया कि जेल में बंद इरफान ने अपने भाई के साथ मिलकर एक योजनाबद्ध तरीके से हत्या करवाई। वह मामले में मुख्य षड्यंत्रकारी है। 
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